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आनलाइन शिक्षा से वर्तमान शिक्षा को कैसे बचाया जा सकता है ?

आनलाइन शिक्षा से वर्तमान शिक्षा को कैसे बचाया जा सकता है ?
      

  📌शिक्षा का अत्यंत  उपयोगी तत्व है, अगली पीढ़ीे लिए मनोवैज्ञानिक उत्पाद को तैयार करता हैI शिक्षा के सार्वभौमीकरण को स्वीकार करते हुए अनावाश्यक और अमनौवैज्ञानिक पद्धतियाँ, शिक्षक और समाज के एकीकृत गठजोड़ द्वारा अनावश्यक रुप से प्रवेश करा दी गयी है। इस शिक्षण प्रणाली के आर्कषण फलस्वरुप समाज में आनलाइन और कम्प्यूटर द्वारा दी जाने वाली अजीवंत शिक्षण प्रणाली समाज के प्रतिष्ठत लोगों ने स्वतः स्वीकार कर ली है। आनलाइन शिक्षा व्यवस्था शिक्षा पद्धतियों को सहज और सरल बनाने के लिए साध्य हो सकती है लेकिन साधन नही। 

     मानव के प्रेम, करूणा, दया,हर्ष, विशाद स्वतः स्फूर्त होने वाले रस है, इनके संवेदना प्रकाट्य के लिए जीवित व संवेदनशील प्राणी का होना आवश्यक है। क्या कभी आपने निर्जीव पर हर्ष, विशाद, करुणा और दया दिखाई दिया है? अपवाद के लिए भद्र जन कह सकते है कि कार्टून, धारावाहिको से बालको में हर्ष, विशाद, करूणा आदि भावों का बोध कराता है ?

      शिक्षण के लिए कार्टून, किल्प, धारावाहिक और बाल फिल्में भद्र जनो के दृष्टिकोण से हर्ष, विशाद तो पैदा करता है लेकिन वह एक मानव की कल्पना जो आप्राकृतिक घटना को प्राकृतिक मानकर चित्रण करती है। वह शिक्षण के लिए एक निश्चित घटना पर विचार कर भावो को बलात् पैदा करता है। यह शिक्षा का आधार स्तम्भ कतई नही हो सकता। यह पद्धति  कक्षा कक्ष में एक समस्या  है कि बालक के मनोभाव और जिज्ञासाए अनंत हाेती है और यह पद्धति एक्ट(बनावाटी) होने के कारण बालक के समस्त मनोभावों को व्यक्त करने में समर्थ नही है। इसके विपरीत मैने महसूस किया है कि कक्षा कक्ष में उचित संप्रेषण, मनोभावो के आदान प्रदान, संवेगी भावो में नियन्त्रण का कार्य कम्प्यूटर और आनलाइन शिक्षा द्वारा किया जाना उचित नही हैI संवेगी भावो को तो केवल एक शिक्षक, माता पिता और बालक के परिवेश से जुडे लोग ही कर सकते है, वह भी बालक की कार्यक्षमता के अनुसार। 

        मनोवैज्ञानिक तथ्यों के अनुसार बच्चो में  संवेगी भाव एक निश्चित आयु में ही बदलते थे परन्तु  वर्तमान में अल्प आयु बालको  के शारीरिक विकास के बदलाव व विपरीत लिंग के प्रति आर्कषण की घटनाए आप प्रायः उस जगह अधिक देखेगें जहॉ के शिक्षा संबधी वातावरण में कम्प्यूटर और आनलाइन शिक्षा का प्रयोग अधिक हो रहा है। यह शोध का भी विषय हो सकता है कि अल्प आयु बालकों में संवेगी भावों के विकास के कारक तथा  आनलाइन शिक्षा से वर्तमान शिक्षा को कैसे बचाया जा सकता है ?

     आनलाइन शिक्षा का विस्तार करते समय भद्रजनों को यह मालूम होना चाहिए कि बालक मशीन नही हैI हम उसके परिवेश को छीनकर कम्प्यूटर के रुप में एक दूसरी दुनिया से जोड़ रहे है जो अल्पआयु बालक के लिए आवश्यक नहीं है। अल्प आयु संगत बालक को उसके चाचा, ताऊ, भाई, बहिन, और पापा मम्मी के ज्ञान के साथ साथ परिवेश से जुड़ी क्स्तुओं यथा चांद-तारो, समुद्र-नदियों, मिट्टी के कंचो को गिनना, सहपाठियों के साथ खेल- खेल कूदना, लड़ना झगड़ना भी आना चाहिए। यह सब आनलाइन शिक्षा का साम्मर्थ्य नही हो सकता हैI इसके लिए बालकों का अधिकतम संख्या में होना आवश्यक है तथा उनको निखारने, सहयोग के लिए शिक्षक का होना भी।

        वैश्विक महामारी के दौरान आनलाइन शिक्षा पद्धति का विकल्प खोज कर प्रस्तुत किया गया। सामान्यतः व्हाट्सएप ग्रुपों, शिक्षण लिंको के माध्यम से पूरे देश शिक्षण कार्यों को जारी करने का आदेश समय समय पर होता रहा है तथा बालक को इसके माध्यम से कक्षा कार्य(निश्चित अवधि मे), गृहकार्य, एसाइनमेन्ट, प्रोजेक्ट वर्क देने की व्यवस्था सुनिश्चित की गयी है।

      आपने विचार किया कि ग्रामीण समाज के पास उच्च स्तर के कम्प्यूटर, मोबाईल को तो छोडिए उनके पास आनलाइन शिक्षा के लिए नेट पैक डलाने के लिए धन भी नही है। यदि किसी तरह वह यह व्यवस्था भी निश्चित कर लेता है तो आप जानकर हैरान रह जाएगे कि विकासशील देशों में नेट स्पीड की क्या दशा है।

         इस दुरुह वातावरण में बालक को आनलाइन शिक्षा प्राप्त करने के लिए कम से कम आठ से नौ घंटे बैठना ही पड़ेगा। अल्पआयु बच्चों के लिए यह किसी सजा से कम नहीं होगा। बालक के लिए यह दशा मानसिक और शारीरिक रुप से घातक होगी। व्हाट्सएप और फेसबुक के अधिकाधिक प्रयोग के कारण आंखो पर जलन, आँखे बड़ी होना जैसी घटनाएँ न्यूज पेपर के माध्यम से पढ़ने को सभी को मिला ही होगा ?

         आनलाइन शिक्षण पद्वति के प्रयोग से भावी देश के नागरिक (बालक) अवसाद, दुश्चिंता, बांझपन, अकेलापन आदि की समस्याओ से ग्रसित होगे। अभी हाल में राष्ट्रीय बाल आयोग ने इस पर आपत्ति लगाते हुए दण्डनीय अपराध भी घोषित किया है।

      यदि  उच्च स्तर स्तर के मनोवैज्ञानिक, डाक्टर, इंजीनियर और भावी नागरिक देश को वास्तव में देने है तो वर्तमान में इस शिक्षण पद्वति को अपनाते समय समाज को ध्यान रखना पड़ेगा कि इसके अमनोवैज्ञानिक तथ्यों को समाज बाहर करे। आनलाइन पद्धति साधन के रुप में नहीं साध्य के रुप में प्रयोग किया जाए।

         बहरहाल सवाल अब भी वहीं है कि क्या ऑनलाइन शिक्षा वर्तमान की  शिक्षा प्रणाली हो सकती है, जो शिक्षक और बालक की पढ़ाई का विकल्प बने सके ?

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📌  आनलाइन शिक्षण  पद्वति के प्रयोग से भावी देश के नागरिक अवसाद, दुश्चिंता, बांझपन, अकेलापन  आदि की समस्याओ से ग्रसित होगे। 
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लेखक के अपने निजी विचार है🚩

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राकेश कुमार(शिक्षक)
जनपद-जालौन

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