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कोरोना



ये करो ना, वो करो ना
कहता है हमसे ये कोरोना।।

छोड़ कर बदनियति अपनी,
इन्सानियत की राह अब तो चुनो ना
   
चरण वंदन की संस्कृति , 
सतयुग मे जो थी, वो सही।।

आज वो संस्कृति हमारी ,
कलयुग अब दिखती नहीं।।

हाय, हैलो का ही देखो,
हर तरफ अब शोर है।।

आदर, सम्मान की बात छोड़ो,
निर्लज्जता सिर मौर है।।

लहू बहाया जिस प्रकृति,
बेआवाज उसके इस प्रहार से,
बच सके तो अब बचो ना।।

ये करो ना, वो करो ना,
कहता है हमसे, ये कोरोना।।
बेजुबानों को भी न छोड़ा,
हमने था अपनी तृप्ति को।।

 अब आह से बचने को उनकी,
 सब लगा रहे अपनी शक्ति को।।

अब कैद मानुष है घरों में,
स्वछंद अब विचरण करो ना।।

ये करो ना, वो करो ना,
कहता है हमसे ये कोरोना।।

वातावरण अब शुद्ध है,
पर मार्ग सब अवरुद्ध है।।

मंदिर, मस्जिद और शिवालय,
प्रकृति के आगे करबद्ध है।।

अब भी मौका है संभल जा,
नीति, नियमो, सभ्यता का,
जीवन अब से तुम जियो ना ।।

ये करो ना,वो करो ना,
कहता है हमसे ये कोरोना ।।


✍️
किरन गुप्ता(प्र0अ0)
 प्रा0 वि0 परसिया
 बांसगांव, गोरखपुर

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