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मजबूर " मजदूर"

मजबूर  " मजदूर"

ये बेबसी की कहानियाँ हम भी सुनाते है...
भारत को फिर से आत्मनिर्भर बनाते है....
ऊँची इमारतों से , हम टकराते है...
खुद मिट कर ,इनकी नीव जो बनाते है....

 हम मजबूरियों का नया भारत  बनाते है....

झूठी उम्मीद , झूठे साथ हम फिर से निभाते है...
मजदूर होने का नयाब दर्द बताते है....
इन पराये शहरों की हैसियत जो बनाते है.....
चमकते शहरों की हजारों खुशियों में अपने गम छुपाते है....

  हम मजबूरियों का नया भारत बनाते है....

हजारों मीलों का सफर ,विश्वास से तय कर जाते है....
मजदूर ! है जनाब , मेहनत की खाते है....

 हम मजबूरियों का नया भारत  बनाते है....

मुश्किलों में इंसानियत को बदलते देख मुस्कुराते है....
इस पूँजीवादी व्यवस्था से घबराते है.....
                   
हम मजबूरियों का नया भारत  बनाते है....
मजदूर है जनाब ! दिल से रिश्ते निभाते है....

✍️
शुभम श्रीवास्तव (स०अ०)
प्राoविoचकभुनगापुर
ब्लॉक-हथगाम 
जनपद-फतेहपुर

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