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आशियाना🏠

आशियाना🏠

बेबस, लाचार ज़िन्दगी से मजबूर.
बिखर गया हूँ ज़र्रे-ज़र्रे में ....
बरसो से जोड़ रखा था
मेहनत की पाइयो से ...
वो आशियाना मेरा ...!
बह गया तिनकों में ।
यू भी कहाँ मिलता है
हर एक को आशियाना ।
अब टूट गई है किश्ती
सब कुछ यू बिखर जाना ।
हर तरफ मिल रहा है ...
बस डूबता किनारा ।
रोटी ! हाँ सिर्फ एक 
रोटी और आशियाने के लिए ही तो ...मैं अपनों से दूर था ।
अपने मासूम बच्चों को बिलखता छोड़ ..! इस चकाचौध दुनिया में
आने को मजबूर था ....।
खुश था अपने बच्चों की
भूख की तपन को मिटाकर ।
क्या पता था आएगा ऐसा सैलाब
जो रख देगा हमे मिट्टी में मिलाकर......!!
अब तो रूकती नही ख़ुशी कही
ठहरता नही कही अपना गम ।
बेरंग हो लौट चले है .....
खाली हाथ आज हम ।
हर तरफ खौफ से दर्दभरी राहे
मीलों-मीलो तक सिसकती आहें ।
टुटते हुए आँखों के सारे ख्वाब 
बेबसी में जकड़ी हुई  ...!
जीवन की हर बात  ।
कहता नही है कोई
कहने को तो बहुत कुछ है ।
सुनता भी नही कोई
सुनने को बहुत कुछ है  ।
वो भी कहाँ सुन रहे है....?
चंद पैसों के लिये जिनका
बोझ हमने उठाया  !
अपनी मेहनत से महल उनका बनाया ।
आँधी है ऐसी आयी ....
हमारा आशियाना न अब रहा ।
भूख बेबसी लिए सैकड़ो... काफिला...नंगे पाँव ...
पैदल ही चल पड़ा ..!
दिखता नही किसी को
दर्द से छलकता आँसू हमारा
कोई तो बता दे आखिर.....!
क्या है कसूर हमारा .?
अब तो बेसहारा बेकामगार  
हो गए है हम ....
न वो उठाने को बोझ रहा
न ही जीविका चलाने का साधन।
मुफलिसों से चल पड़े है 
सिर पे खुद को उठाये हम ।
शायद फिर से पहुँच जाये...अपने
उसी टूटे से आशियाने पे हम ।
फिर से मेहनतकश इरादों से
नया आशियाना बना लेंगे हम ।
लेकिन ....?
फिर कोई आँधी हमे झकझोरेगी
और फिर  ....
क्षण में उजड़ जायेगी...हमारे 
जीवन भर की मेहनत से 
बसी बस्ती ..!
तभी तो .!
सदियो से अब तक  मै
बेबस लाचार गरीब मजदूर हूँ ।
रोज उजड़ता -संवरता है
मेरे जीवन का फ़साना ....!
वैसे भी कहाँ मिलता है
हमको..........
ख्वाबो का आशियाना ..।।
    
✍️
दीप्ति राय (दीपांजलि)सoअo
प्राo विo रायगंज 
खोराबार गोरखपुर

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