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नव अंकुर

नव  अंकुर
🧚‍♀️🧚‍♂️🧚
(भ्रूण  हत्या  के  सन्दर्भ  मे )


एक  कली  जब  उदित  हुई  थी, 
जीवन  पथ  पर  चलने  को  तत्पर  थी !
ह्रदय  मे  कुछ  अरमान  थे  उसके, 
कुछ  अधूरे  ख्वाब  थे  उसके !

उसने  देखा  न  था  संसार  को, 
लोगों  के  अत्याचार  को, 
अनछुई, अधखुली, अलसाई  हुई, 
अपनी  ही  बाहों  मे  छिपी सकुचाई  हुई !

न  ज्ञात  था  उसको  यह  अत्याचार , 
लोगों  के  निर्दय , निर्मम  विचार, 
जब  अलग  किया  उसको  जड़  से, 
उसकी  दुनिया  उसके  घर  से !

जब  टूटा  उसका सवप्न राग, 
धुल गए  अधूरे  उसके  ख्वाब, 
मसल  दिया  उसके  स्वप्नों  को,  
बिखर  गए  उसके जज़्बात !

जब नव अंकुर  को  तोड़  दिया, 
उसने  नवजीवन  छोड़  दिया, 
न  चीख  उठी  न  अश्रु  बहे, 
घुट -घुट  कर  दम  को  तोड़  दिया !

इस  मृत्यु  का  न  कोई  न्याय  हुआ, 
न शोक  हुआ  न  श्राद्ध  हुआ, 
एक  बहन  गयी , एक माँ  तड़पी, 
एक  बेटी  पर  अन्याय  हुआ !

उसने  न  जाना  ममता  को, 
न  देखा  जीवन  का  बसंत, 
नव किसलय  का  नव  कोपल  का, 
नव  अंकुर  का  हो  गया  अंत!

एक  जननी  के  ही  आंचल  मे, 
एक  जननी  का  हो  गया  अंत, 
एक जननी  का  हो  गया  अंत !!

✍️
नीरजा बसंती (स.अ.)
 प्रा. विद्यालय  गहना 
  ब्लाक -खजनी 
     गोरखपुर

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