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सेवानिवृत्ति

सेवानिवृत्ति

        जैसे-जैसे सेवानिवृत्ति का समय नजदीक आ रहा था वैसे वैसे कार्यालय के पूरे स्टाफ में उनके विदाई समारोह की तैयारी जोरों पर चल रही थीं.स्टाफ के सभी उच्चाधिकारी  या कर्मचारी उनके साथ बिताए गए 10 वर्षों में किए गए कार्यों की भूरी भूरी प्रशंसा करते थे.

         कमलाकांत पिछले महीने जूनियर इंजीनियर के पद से सेवानिवृत्त हुए थे.गत माह के 25 तारीख को स्टाफ ने विदाई देने के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन किया. वरिष्ठ-कनिष्ठ मिलाकर कुल 16 लोग थे. बारी- बारी से सबने उनका गुणगान किया. इस क्रिया में उनके उच्चाधिकारी सबसे आगे थे, हों भी क्यों न.. आखिर कमलाकान्त जी ने कई बार रजिस्टर में उनकी अनुपस्थिति को उपस्थिति में जो बदला था, कई बार ठेकेदारों से हुए झगड़ों को भी सुलझाया था.साथ ही अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को शायद ही अपनी उपस्थिति में एक पैसा खर्च करने दिया हो.

         विदाई के दिन होटल से चाय नाश्ता पकौड़ी वगैरह का इंतजाम किया गया था. अनुचर ने सोचा था कि इतने भल मानुष की विदाई है तो काहे न कायदे से किया जाए.फोटोग्राफी भी हुई.सभी छोटे बड़े अधिकारीयों/कर्मचारियों ने कमलाकांत जी से हाथ मिलाते हुए फोटो खिंचवाया. कार्यक्रम समाप्त हुआ, कमलाकांत जी को गाड़ी में बैठा कर प्रस्थान किया गया.

तीसरे दिन......(कमलाकांत के पूर्व के कार्यालय में) 

बड़े साहब किधर हैं ? होटल के कर्मचारी और फोटोग्राफर ने एक स्वर में स्वीपर से पूछा.

इधर से सीधे जाओ और बाएं मुड़ जाना ठीक सामने ही उनका रूम है.. रूम नंबर 12.

 साहब ! ये बिल है.. चाय-नाश्ते का.. 2100 रु. देना है... 
साहब  ! ये बिल..जो फोटोग्राफी हुई थी.. 1500 रु. ये है फोटो.

  दोनों अपने अपने बिल साहब की ओर बढ़ाते हुए बोले.

 ठीक है ठीक है यह सब अपने पास रखो कल 2:00 बजे के बाद आओ. 

इस बीच..... 

 बड़े साहब ने सभी की मीटिंग बुलाई और जो निर्णय हुआ.'...' को..बता दिया गया.

अगले दिन सुबह कमलाकांत के घर पर........

आओ लक्खन आवो...कैसे हो ? और सब लोग ठीक हैं ना...क्या करूं अभी दो ही दिन हुए लेकिन घर पर मन नहीं लग रहा है. मन कर रहा है कि दो तीन घंटे के लिए आफिस ही आ जाया करुं.बैठो बैठो चाय पानी पीयो.

हां साहब सब ठीक है..... भर्राये स्वर में लक्खन बिल और फोटोग्राफ कमलाकांत की ओर बढ़ाते हुए बोला.

 कमलाकांत जी एक एक कर जैसे जैसे फोटो देखते वैसे वैसे उनके आंखों से प्रेम निर्झर झरने लगे..... कुछ पलों बाद जैसे ही उन्होंने कागज खोला बिल देख हृदय विदीर्ण हो गया और मन में सोचने लगे कि क्या यही 10 वर्ष साथ रहने का पुरस्कार है.

✍️
डॉ०अनिल गुप्ता
प्रधानाध्यापक
प्राoविoलमती
विकास खंड-बांसगांव
जनपद-गोरखपुर

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