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बीत जाए यह दुःखमय रजनी

बीत जाए यह दुःखमय रजनी
निरभ्र आकाश में फैली हुयी 
यह म्लान कांति कैसी !
जग सारा रोता हुआ ,  
घुट रही श्वांस  हो जैसी
सोच रही मै मन ही मन सजनी
बस बीत जाय यह दुखमय रजनी

वक्त का पहिया थमा है 
क्रूर है लोलुपता की कटार
सभ्यता के सर्वनाश को 
मानव ही हुआ है तैयार
भान हुआ है सहसा सबको 
कुछ क्षुद्र जीवों की है जो करनी 
सोच रही मै मन ही मन सजनी
बीत जाए यह करुणित रजनी

आओ मिलकर करें संकल्प 
इस समस्या का ढूंढे विकल्प
प्रकृति से  न करें खिलवाड़ 
संयमित आहार बचाए प्राण
साफ सफाई का रक्खें ध्यान
विश्व का तभी होगा कल्यान
जग से है बस विनती ही इतनी 
बीत जाए यह दुख मय रजनी 

✍️
रचयिता
श्रेया द्विवेदी
सहायक अध्यापक
प्राथमिक विद्यालय देबीगंज प्रथम
कड़ा कौशाम्बी

2 comments:

  1. उत्तम रचना।।
    कौशाम्बी की गौरवशाली लेखिका श्रीमती श्रेया जी को साधुवाद।

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