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रोटी की चोरी

रोटी की चोरी

मां ने सिखलाया था मुझे,
बच्चे मन के होते सच्चे।
पर मैं तो सच्चा रहा नहीं,
बिल्कुल अच्छा रहा नहीं ।
कल मैंने की थी चोरी,
चुराई थी राशन की बोरी।
पर मैं भी करता क्या मेरी मां,
छोटी का रो - रो के हाल बुरा।
एक रोटी ही तो चाहती थी,
वह भी उसको दे ना सका।
उसकी पीड़ा हर न सका।।
मृत्यु शैय्या पर पड़ गई,
तड़प-तड़प कर वह मर गई।
इतनी बड़ी दुनिया में ,
मैं अकेला रह गया।
एक रोटी की तड़प में,
मेरा सब कुछ बह गया।।
हे ईश्वर क्यों नहीं है मेरी मां,
मुझको आज तू ये तो बता।
गर होती मेरे पास भी मां,
मेरी छोटी भी होती यहाँ।
कैसे मैं सब भूल पाऊंगा,
तेरे बिन कैसे रह पाऊंगा।
अब जल्दी से बड़ा हो जाऊँ,
ढेर सारी रोटी कमाऊँ।
 हर घर की छोटी को दे आऊँ,
  सब की खुशियां वापस लाऊँ।
कर लेता हूं खुद से प्रण,
व्यर्थ न जाए एक भी क्षण। 
 हर छोटी को है मुझे जियाना,     
है हर गरीब को समृद्ध बनाना।

✍️
सुप्रिया मिश्रा (स.अ)
प्रा.वि.गंगा पिपरा
क्षेत्र-खजनी
जनपद-गोरखपुर

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