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माँ

माँ

सत्य सनातन तू ही,तू ही जग आधार।
ममता में मांँ तेरे,बसता सब संसार।।

धरा सा धीरज धारण करती,बिन बोले सब कह जाती तू।
सागर सा गहरा प्रेम है तेरा,पर सरिता सा बह जाती तू।।

मुझे खिलाने की खातिर,अक्सर भूखे रह जाती तू।
मेरी क्रीड़ा में ही,हर पीड़ा सह जाती तू।।

गुस्ताख़ी जब मेरी होती,होठों को सिल जाती तू।
नादानी को देख मेरे,कलियों सा खिल जाती तू।।

पल-पल अपनी खुशियांँ बेच,हर पल मुझे पढ़ाती तू।
इस कौड़ी को हीरा कह,मेरा मान बढ़ाती तू।।

क्षण-क्षण चिंता मेरी रहती,मुझमें आंँख गड़ाती तू।
बरफ़ वाला जब हार्न बजाता,छुट्टे तब पकड़ाती तू।।

यादों में अब भीगी पलकें,आँख मेरी झुक जाती है।
अश्कों में अब अक्स तेरा,यह कलम आज रुक जाती है।।

✍️
अलकेश मणि त्रिपाठी "अविरल"(सoअo)
पू०मा०वि०- दुबौली
विकास क्षेत्र- सलेमपुर
जनपद- देवरिया (उoप्रo)

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