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गज़ल

इंसान के गुरूर का अंजाम ही तो है,
हर ओर आज देखिए कोहराम ही तो है|

मायूसियों के दौर में संयम नियम रहे,
कुदरत ने दे दिया हमें पैगाम ही तो है|

नासाफ़ सी फ़जाओं में सुकून क्यों नही,
मंजर दिखे तबाहियों के आम ही तो है|

है कौन मानता यहाँ पर अपनी गल्तियाँ,
लेते सभी मुकद्दर का नाम ही तो है |

आजाद हैं परिंदे कैद घर में आदमी,
आखिर किसी गुनाह का इलजाम ही तो है|

✍   लेखिका :
निरुपमा मिश्रा
शिक्षिका
जनपद : बाराबंकी


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