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दीप-दीप्ति

दीप-दीप्ति

(वाकई हमारे देश में विविधता का बहुरंगी प्रवाह है जो भाव सरिताओं के रूप में अबाध गति से प्रेम सागर में विलीन होने को उद्यत रहता है। अपेक्षाकृत सीमित संसाधनों के बावजूद यहांँ श्रद्धा चरम पर होती है और इस श्रद्धा में ही समस्त समाधान निहित होता है...)

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खंड खंड अखंड हुआ,
प्रयास भी खूब प्रचंड हुआ।
मंजिल हमसे दूर नहीं,
यकीन न यदि विखंड हुआ।।

ज़र्रा-ज़र्रा जागृत इसका,
एकत्व यहांँ ज्वलंत हुआ।
देख निशा की छटा निराली,
हर्ष मुझे अत्यंत हुआ।।

व्यक्ति-व्यक्ति अभिव्यक्त हुआ,
भारत आज सशक्त हुआ।
देख यहाँ की प्रभुता न्यारी,
सारा जग आसक्त हुआ।।

विभेद भाव यूँ भग्न हुआ,
देश प्रेम में मग्न हुआ।
इस दीप-पर्व की बेला में,
'कोरोना' भी नग्न हुआ।।
 
दीप दीप्तिमान रहे,भारत मेरा महान रहे!
 
🇮🇳जय हिंद🇮🇳
✍️
अलकेश मणि त्रिपाठी "अविरल"(सoअo)
पू०मा०वि०- दुबौली
विकास क्षेत्र- सलेमपुर
जनपद- देवरिया (उoप्रo)

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