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बालश्रम

बालश्रम

वाह रे बालक का बचपन,
पेट में जब भूख ने ली अँगडाईया,
चल दिया वह कर्म पथ पर  ।
वाह रे बालक का बचपन ।
न तन पर वस्त्र हैं उसके,
न तेल कंघी  बालों में, कलम कापी पकड़ने की उमर में,
वह काम करता खेत और खलिहान पर ।
वाह रे! बालक का बचपन । 
हाय रे मजबूरिया उसकी, कठिन है घर की जिम्मेदारियाँ उसकी,
सोचता वह बालश्रम से रहू दूर,
जिऊ मैं भी अपना बचपन उन्मुक्त भरपूर,
सोचता वह नहीं करनी है मुझे मजदूरी,
यह कंकड पत्थर ढोना क्या है जरूरी  ?
आज आहतहै उसका   तन और मन, 
वाह रे! बालक का बचपन।
बाल मन यह सोचता है  रात दिन, 
क्या गुनाह  मैंने किया है गिन -गिन,
तकलीफे उठाता हूँ मेहनत मैं करता अनगिनत,
फिर भी न पेट भरने को मिलती है रोटी मुझे,
हे प्रभु !बस दे दे दया तूइतनी मुझे,
और बच्चों की तरह जिऊ मैं अपना बालपन वाह रे! बालक का बचपन ।
सोचता हूँ पढ़ -लिखकर मैंभी  होशियार बन जाऊँ,
नाम अपने देश और गाव  का रोशन कर जाऊँ,  
सोचता हूँ जुल्म  इतना सहता है क्यूँ?
 ये कोमल तन,
मुक्त होऊ बाल श्रम से छू लू मैं नीला गगन,
वाह रे! बालक का बचपन.............

✍️
पूनम श्रीवास्तव(स०अ०)
पूर्व माध्यमिक विद्यालय गुलवागौरी 
बिलरियागंज, आज़मगढ़

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