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बालश्रम

बालश्रम

एक करुण दृश्य देखा मैंने,
मन विचलित करने वाला था,
वो अधरों पर मुस्कान लिए,
हाथों में जूठा प्याला था ।

उसकी दृष्टि थी मेरी ओर,
शायद कुछ कहने वाला था,
उम्र में सात बरस का था,
पर आँखों में दिव्य उजाला था ।

वो जानता था मैं शिक्षक हूँ,
तभी मुझसे आस लगाया था,
क्या मैं भी पढ़ने आ सकता,
बस यही पूछने वाला था ।

तभी एकदम से आवाज़ हुई,
उसके बाबा ने उसे बुलाया था,
छोटू जा के दो चाय दे आ,
क्रोधित आदेश लगाया था ।

वो सर पट भागा अंदर को,
मन व्याकुल होने वाला था,
उसके नयनों के प्रश्नों का,
जैसे उत्तर मिलने वाला था ।

जो नन्हें हाथ क़लम के थे,
बेबसी का उन पर साया था,
कैसे उनको स्वतंत्र करूं,
मन द्रवित, हृदय बेचारा था ।

उस मुख-आभा पर प्रश्न बड़े,
पर भाग्य पर जैसे ताला था,
एक करुण दृश्य देखा मैंने,
मन विचलित करने वाला था ।

✍️
दीक्षा मिश्रा(स०अ०)
प्राथमिक विद्यालय असनी द्वितीय
शि०क्षे०:-भिटौरा
जनपद:- फतेहपुर

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