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आज की आवाज

आज की आवाज     
     
सबके बाद याद आया तो वतन याद आया
किस बीमारी के शिकार हो गए सब
घर लौटने की जिद है अब
होली भी बीत गया जब
किस व्यवस्था में गिरफ्तार हो गये हम,
हाथ तो रुके मगर रुके नहीं कदम।
उनकी चाहत से दरकिनार नहीं हम,
लेकिन उन्हें रोकना होगा और बताना होगा कि उनसे दूर नहीं हम।
किस ख्वाहिश के गुलाम हो गये हम, 
भीड़ में शामिल हुए तब जब,अकेलापन हुआ मरहम
साथ रहने की चाहत ने सबको अलग कर दिया 
दायरा बढ़ने लगा सिमटने लगे हम।
आजादी का सबब भी क्या रंग लाई है
सड़कों पर पसरा सन्नाटा, चेहरे पर मायूसी छाई है
अब और जद्दोजहद नहीं बस, आज को बचाना है 
गहरे तिमिर की धुंध में एक रोशनी जलाना हैl

✍️
संगीता श्रीवास्तव (प्र.अ.)
 प्रा.वि.झरवा
 क्षेत्र-खोराबार
जनपद-गोरखपुर

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