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📌बालश्रम गीत

📌बालश्रम गीत
 कैसे बचेंगे नन्हे बच्चे आज,
पीड़ित है ममता लख गरीबी को आज,
मन द्रवित होता है, बालश्रम देख के...

 छोटे छोटे बच्चे,चले हाथो में थैले को लेकर,
जिम्मेदारियां सबकी लेके चलते नन्हे कंधों पर, कैसी मजबूरी है किस्मत के मारों का...
 मन द्रवित होता हैं...............

 ये जो उम्र है उनकी खेलने लिखने पढ़ने खाने की, 
मां के आंचल में छुप के, सारे गम को भुलाने की,
कैसी मजबूरी है घर चलाने की.........
मन द्रवित होता है.................

नौनिहालों को लखती आत्मा मेरी पल- पल है दुखती, 
जिंदगी को उनकी ,रंगों से सुनहरे सजा दु, थोड़ी रोशनी पा के जगमगाये उनकी जिंदगानी, 
सोचती हूं करती हूं प्रीत में निहित हो कर  खुशियां देने को...........
मन द्रवित होता है बाल श्रम देखके.......

बाल मन ये सोचे, जीवन मेरा भी उन्मुक्त होता,
ना बेबस ना लाचारी ,नाही कंधों पर हो जिम्मेदारी,
पढ़ता मैं लिखता मैं , पूरा करता सपनों को माँ- बाबा के,
मन द्रवित होता है बालश्रम देख के ........

 ✍
 ममताप्रीति श्रीवास्तव
स0अ0, प्रा0 वि0 बेईली
 बड़हलगंज,  गोरखपुर

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