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शिक्षक संकुल बैठकें क्यों बन रही हैं नीरस और अनुत्पादक? जानिए! एक कविता के द्वारा

शिक्षक संकुल बैठकें क्यों बन रही हैं नीरस और अनुत्पादक? जानिए!  एक कविता के द्वारा



उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षकों के लिए शिक्षक संकुल बैठकें एक महत्वपूर्ण अवसर हैं, जहाँ वे अपने अनुभवों को साझा कर सकते हैं, नवाचार सीख सकते हैं, और एक-दूसरे से प्रेरणा ले सकते हैं। 


लेकिन वर्तमान व्यवस्था में, ये बैठकें शिक्षकों के लिए एक बोझ बन जाती हैं। दिन भर विद्यालय में काम करने के बाद, दो घंटे की बैठक में भाग लेना उनके लिए बहुत मुश्किल होता है। इस कारण, बैठकें अक्सर नीरस और अनुत्पादक होती हैं।


कविता में, लेखक इस निराशाजनक स्थिति पर चिंता व्यक्त करता है। वह कहता है कि शिक्षक सीखना तो चाहते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें एक उत्साही माहौल की जरूरत है। इसके लिए सबसे जरूरी है कि बैठकों का समय विद्यालय के बाद नहीं, बल्कि विद्यालय के समय में ही किया जाए। इससे शिक्षकों को बैठकों में भाग लेने के लिए पर्याप्त ऊर्जा मिलेगी, और वे इन बैठकों से अधिक लाभान्वित हो पाएंगे।




दिन भर विद्यालय में,
सीखा, पढ़ाया, समझाया,
बच्चों को ज्ञान दिया,
उनका भविष्य बनाया।


अब थके हुए हैं शिक्षक,
ऊर्जा है समाप्त,
फिर भी जाना है संकुल,
दो घंटे की बैठक के लिए।


कहाँ से आएगी ऊर्जा,
शिक्षण के बाद की बैठक में,
कैसे होगा सीखना,
थकी हुई मनोदशा में।


शिक्षक सीखना तो चाहते हैं,
लेकिन उत्साही माहौल चाहिए,
इसलिए जरूरी है कि,
बैठकों का समय बदला जाए।


विद्यालय के समय में,
बैठकों का आयोजन हो,
तब शिक्षकों में होगी,
सीखने की तीव्र चाह।



✍️ लेखक : प्रवीण त्रिवेदी
शिक्षा, शिक्षण और शिक्षकों से जुड़े मुद्दों के लिए समर्पित
फतेहपुर


परिचय

बेसिक शिक्षक के रूप में कार्यरत आकांक्षी जनपद फ़तेहपुर से आने वाले "प्रवीण त्रिवेदी" शिक्षा से जुड़े लगभग हर मामलों पर और हर फोरम पर अपनी राय रखने के लिए जाने जाते हैं। शिक्षा के नीतिगत पहलू से लेकर विद्यालय के अंदर बच्चों के अधिकार व उनकी आवाजें और शिक्षकों की शिक्षण से लेकर उनकी सेवाओं की समस्याओं और समाधान पर वह लगातार सक्रिय रहते हैं।

शिक्षा विशेष रूप से "प्राथमिक शिक्षा" को लेकर उनके आलेख कई पत्र पत्रिकाओं , साइट्स और समाचार पत्रों में लगातार प्रकाशित होते रहते हैं। "प्राइमरी का मास्टर" ब्लॉग के जरिये भी शिक्षा से जुड़े मुद्दों और सामजिक सरोकारों पर बराबर सार्वजनिक चर्चा व उसके समाधान को लेकर लगातार सक्रियता से मुखर रहते है।

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