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परिवार

परिवार

किसी व्यक्ति के लिए खुशियों का संसार उसका परिवार ही है।सात वार के बाद शायद आठवांँ वार यही है जहांँ इंसान को सुकून मिलता है।खुशी हो या गम यहांँ बांँट लेने के बाद सुखद एहसास होता है।
     पर दुर्भाग्य...! अब सब कुछ उलट-पुलट हो गया है।परिवर्तन की बयार ऐसी चली कि सगे-सम्बन्धी खुर्द-बुर्द हो गए।हर व्यक्ति तनहा होता चला गया।किसी के पास किसी के लिए कोई संवेदना नहीं बची... बची तो सिर्फ वेदना,जो अब बाहर भी नहीं निकल सकती।
       भौतिक संसाधनों व भोग विलास के बीच भी मानव ऐसे जी रहा है मानो दम घुट रहा हो!वक्त को पकड़ने की होड़ कुछ यूँ चल पड़ी कि अपनों के लिए तो दूर,अपने लिए भी वक्त नहीं बचा कि कभी सोच भी ले...क्या खोया,क्या पाया?
       एकाकीपन व नीरसता के तो ऐसे आदी हुए कि चेहरे की सारी भाव-भंगिमाएंँ ही गायब हो गईं... पता ही नहीं चलता कि वे कब खुश हैं और कब नाराज?
        पीछे पलटने की फुर्सत कहांँ?बस आगे ही बढ़े जा रहे हैं..... इतना आगे कि अपने पीछे छूटे जा रहे हैं।
        कुछ कौड़ियाँ ही इतनी मूल्यवान हो गईं कि सब कुछ ताक पर रख दिया मानव ने!यह भूल गया कि सपनों के संसार से तो बेहतर अपनों का बहार है,सिक्कों की खनक से कहीं ज्यादा खूबसूरत उन बच्चों की किलकारियाँ हैं जो अक्सर घर में बैठे बड़ों के राह निहारते रहते हैं... पर ये क्या..? उनकी भी आंँखें पथरा जाती हैं,उर से उठती तरंगे हिलोरे ले-ले थक चुकी होती हैं... आखिर उनके आते-आते ये बेचारे भी बिन लोरी के ही नींद ले रहे होते हैं,शायद इस आस में कि सुबह दीदार जरूर होगा... अफसोस!यह भी सच नहीं हो पाता... जिन्हें वो तलाशते रहे,वह तो फिर निकल पड़े थे कौड़ियों की तलाश में...
       बदलते वक्त के साथ पारिवारिक पृष्ठभूमि भी कब बदल गई,संयुक्तता की दीवार भी कब दरक गई,पता ही नहीं चला! एक छोटा सा आंँगन जो कभी घर का एक अहम हिस्सा हुआ करता था, कई हिस्सों में बँट गया। उसके छाती को चीरती कई दीवारें खड़ी हो गईं। हम रामायण देखते रहे,घर में महाभारत होता रहा...हम नीति की बातें करते रहे,उधर उल्लंघन होता रहा...।
      अभिव्यक्ति की आजादी भी इतनी!कि जो मन में आए,व्यक्त कर लो... कोई रोक-टोक नहीं।बड़े-बूढ़ों का यह अधिकार तो शायद हमने बहुत पहले ही छीन लिया था।अब हम जो बोलें,वो सही!जो करें वो सही! यानी की पूरी मनमानी...। पहले ऐसा नहीं था।हमने तो देखा है ग्रामीण जीवन में...ऐसी व्यवस्था थी कि किसी के घर जब भी कोई विकृति जन्म लेती थी तो उसे सामाजिक रूप से बहिष्कृत कर दिया जाता था जिससे ज़्यादातर भूल सुधार कर घर वापसी कर लेते थे।तत्समय सुधार की भी पूरी गुंजाइश हुआ करती थी,सुधरने के सुअवसर सुलभ थे।
    अब तो घर के बड़े-बुजुर्ग भी सदमें में रहते हैं... ज़बान पर ताला लगा लिया और कान में ठप्पी... कौन संकट मोल ले...?कम से कम मातृभूमि का स्पर्श तो मयस्सर है... क्या पता वृद्धाश्रम में यह मिट्टी ले जाने की इजाज़त हो न हो...!


✍️
अलकेश मणि त्रिपाठी "अविरल"(सoअo)
पू०मा०वि०- दुबौली
विकास क्षेत्र- सलेमपुर
जनपद- देवरिया (उoप्रo)

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