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घर

घर
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मेरे घर में
मैं कभी अकेला नहीं
रहता, मेरे
साथ - साथ रहती है
उम्मीदें, ख्वाहिशें, जरूरतें, जिम्मेदारियां 
जो फड़फड़ाने लगतीं है
दिन के उजालों के साथ और 
शाम होते ही
चस्पा हो जाती है
कमरे की बदरंग दीवारों पर
जिनके साथ 
सारी - सारी रात  जागती हैं 
आंखें 
करवटें बदलते हुए
कि अभी
जीने के लिए
जिंदगी के नाम लिखने है
बहुत से खत...


✍️राजीव कुमार
स. अध्यापक
पू. मा. वि. हाफ़िज़ नगर
क्षेत्र - भटहट
जनपद - गोरखपुर

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