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पर्यावरण से प्यार

पर्यावरण से प्यार🌍🌳

विचलित है कम्पित है ....?
हरा भरा धरा का                                  
निर्मल स्वच्छ स्वरूप....
खो रहा है क्यों ये जीवनदायनी
धरा का निर्मल स्वरूप ।
उजड़ रहा जो ये स्वरूप नितपल
सहेज लो तुम उसको प्रतिपल
हरी भरी ये सृष्टि सारी
हरा भरा ये पूरा संसार
हे नर! तुम क्यों समझ न पाये
यही तो तेरे जीने का आधार ।
सुन लो करुण सा चित्कार !
दे दो उसको निर्मल सा प्यार ।
जो होगी धरा की क्षति
चहु ओर होगी विकृति ।
पर्यावरण धूमिल हो जायेगा
मंजर फिर ऐसा आएगा ।
भूकम्प सुनामी आपदायें
सबका जीवन खा जाएगा ।
दूषित हुई जो वायु ......फिर
वो न शुद्ध होगी !
मुक्त करो अब इसको मिलकर
धुएं कचरे अपशिष्टों से ..!
ईश्वर ने जो भेंट किया
उसे सम्भालो एक परिवर्तन से ।
कर रहे जीवन से अपने खुद
हर रोज अमानवीय खिलवाड़
काट रहे अपने लालच में 
हरे भरे पेड़ रोज हजार
जनसंख्या की भार कर रही
पर्यावरण पर बार बार प्रहार ।
नदियो में नित मिलता जाता
रसायनों का भण्डार ....।
थलचर जलचर हुए भयभीत
जीना अब इनका दुस्वार ।
कुदरत भी लाचार हो गई !
आखिर क्यों ? कर रहे हम
पर्यावरण पर अत्याचार !
छोड़ो बड़ी बातो को
छोटा सा एक कदम उठाये
अपनी प्यारी धरा को फिर से
हरा भरा खुशहाल बनाये ।
पहले का वो रूप सुहाना
शुद्ध हवा शुद्ध जल व् खाना
वो सारा कुछ वापस पाये ।
हर कोने हर आँगन में
एक एक वृक्ष लगाये ।
हो जायेगा फिर से धानी
निर्मल स्वच्छ संसार
तभी तो हम ....पर्यावरण से
पर्यावरण हमसे.....
कर सकेगा  ........प्यार ।।

✍️
दीप्ति राय(दीपांजलि)सoअo
प्राo विo रायगंज खोराबार
गोरखपुर

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