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वजूद

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झीलों के तन और सरिता के बदन में
अंतर जरा सा है दोनों के चाल चलन में 
एक ठहरी हुई काया लिए ,है दूसरी जो
खुले केशों की उन्मादी में चलती है मस्त गगन में
चाहने वाले हजारों बड़ा सुंदर सा परिवेश परिवेश है
मुस्कुराहटें बिखरी हुई चेहरे से विशेष है
हमारे मन को भाती है सजाती है लुभाती है किंतु मन मे मैल है और पंक ही अवशेष है

वो अनवरत चलती हुई है निर्झरा
दुख दूर करती है सुखी करती धरा
जगतमे म।न पाकर भी न भूले खुद की मर्यादा
मिटाकर खुद के जीवन को निभाती प्यार का वादा

ऊपरी दर्शन को लोगों ने सँवारा
है सोंच सीमित और सीमित दायरा
दर्द सहती किन्तु बहती अविरली धारा
मा तु कहता है जगत तारती जीवन धारा


है खूबसूरत ,एक मे साहस नहीं वो रुक गयी है
जगत के द्वन्द संघर्षों के आगे झुक गयी है 
उलझती कंकड़ों को चीरती चली जाती है
निर्मली तृष्णा मिटाती है जगत में मान पाती है 

  मिटाई प्यास दुनिया की औ लड़ने की तरफदारी रही है
आशीष  दुनिया में असल सम्मानों का हकदारी वही है।

✍ रचनाकार
    आशीष त्रिपाठी
    स0अ0
    उ0प्रा0वि0 - मवइया
    क्षेत्र - असोथर
    जनपद - फतेहपुर

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