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बेटियां

सुना है बड़े नसीब से मिलती हैं बेटियां,
फिर क्यों दहेज़ की आग में जलती हैं बेटियां।

कभी बेटी-बहन तो कभी पत्नी बहू, भाभी...
यूँ रोज़ नए-नए सांचों में ढलती हैं बेटियां।

पुरुष प्रधान समाज की बदली नहीं ज़हनियत,
आज भी बची-खुची खाकर पलती हैं बेटियां।

कहते हैं रहमत के फरिश्ते आते हैं वहां,
जिस घर के आंगन में मचलती हैं बेटियां।

अपना घर किसे कहें, यह ससुराल वह मायका
इस तरह नए-नए ठिकाने बदलती हैं बेटियां।

मां की हिदायतें, बाबुल की इज़्ज़त का भरम,
ठोकर भी लगे तो खुद ही संभलती हैं बेटियां।

बराबरी-तरक़्क़ी की बात आज भी है बेमानी
चुभती देखी बेटियां, कभी खलती हैं बेटियां। 

रचयिता
नुज़हत राना (स.अ.)
प्राथमिक विद्यालय निनौरा श्रृंखलापुर
शिक्षा खंड कमालगंज
ज़िला फ़र्रुख़ाबाद

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