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संजीवनी

धन की चकाचौंध एवं विवेक की कमी से....कमली ने जहां भाई-बहन (खून) के रिश्ते पर मैल जमा कर दी थी वहीं निर्मला (परायी) के विवेकयुक्त व्यवहार (राखी के डोर)ने उस मैल को धुल दिया जो रमई के लिए संजीवनी का काम की......... 'संजीवनी' है....धन और विवेक से जद्दोजहद की कहानी जिसमें विवेक न अंतत: बाजी मार ली.......
             
            ....रमई की पथराई आंखों में गाढ़े आंसू थे...आंसू क्या थे....समझिये खून थे... व्यक्ति दूसरों का मारा थप्पड़ भूल जाता है लेकिन अपनों द्वारा ...बोली की मार को नही भूलता....... अभी कल ही तो गया था (कमली के घर)लगभग...५ वर्षों बाद...मारे ढिठाई से कि इस बार कमली से राखी बंधवा कर ही आयेगा.पिछले ५ वर्षों का इकट्ठे....राखी बंधवाई अपना बिहौती सिकड़(चेन) आज उसे दे देगा इसके लिए उसने घरवाली से बाकायदे स्वीकृति भी ले ली थी.....लेकिन कमली ने कुछ ऐसा कह दिया कि पौ फटने से पहले ही वह वापस रामू(बेटे) के साथ घर आ गया.......खटिया पर लेटते ही उसको पुरानी बातें एक-एक कर याद आने लगीं........
            कमली को कॉलरा हुआ था.....इतनी गम्भीर बीमार थी कि बचना मुश्किल था.....लेकिन उसने गाय बेचकर उसका इलाज कराया था.
        अपने निरक्षर रहा लेकिन कमली की पढ़ाई मे कोई कोर कसर नही छोड़ा.... ५ किमी. दूर हाईस्कूल में दाखिला कराया था....उसको पहुंचाने और लाने की.....जिम्मेदारी का निर्वहन खुद करता था...
   यही सोचकर उसकी सांसे तेज होने लगी आंखों से आंसू आने लगे.......
            रमई का ब्याह हुए कुछ दिन बीते होंगे कि उसके मां-बाप एक दुर्घटना में भगवान को प्यारे हो गये......उस पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा....पारिवारिक जायदाद के नाम पर २ बीघा जमीन एक ठांठ गाय....और वही पुस्तैनी खपरैल मकान जो बरसात में कई जगहों से रिसता रहता था.........
        सब्जी बेचने का काम करता था रमई...घर के नजदीक ही जमीन होने के कारण कोईरार(सब्जी की खेती) बढ़ियां हो जाती थी.सब्जी बेचने से होने वाली आय से ही उसकी गृहस्थी चलती थी......मने...उसकी आय का स्रोत वही २ बीघा जमीन ही थी........ पारिवारिक जिम्मेदारी ने उसे जवान होने ही नही दिया..... अपने दोनों बच्चों का ख्याल उतना नही कर पाता था जितना कमली पर उसका ध्यान रहता.....मां के कहे अंतिम वाक्य.....बेटा कमली क्अ ध्यान रखिअ् ..तूं ही ओकर माई बाप ह् व्.... उसे अन्दर से झकझोर देता था..........
         कहते हैं कि ....'लड़की जब जवान होती है तो घर वालों से पहले मुहल्लों वालों को पता चलता है'.....टोला मुहल्ला वाले फुंसफुंसाते रहते कि अबले बाप रहल होत त् बियाह हो गईल होत.....अरे ओकर बेटी रहत् तब न पता चलत....... जबकि अभी कमली १८ बसंत भी नही देख पायी थी........लेकिन जिम्मेदारी.. जिम्मेदारी होती है इसका एहसास था रमई को.....तभी तो पिछले ३ वर्षों से कमली के लिए खाते-पीते घर अौर सुयोग्य वर की तलाश में नात रिश्तेदारों के यहां चक्कर मारा करता था.......... काफी मशक्कत् के बाद कोमलकान्त के रूप में उसकी खोज खत्म हुई....... कोमलकान्त... नाम के अनुरूप ही सुन्दर....सुडौल...शरीर था.....लेकिन कोमलकान्त की बोली (दहेज) ऊंची थी....क्यों न हो भाई.... पढ़े लिखे थे..... शिक्षा विभाग में बाबू थे...उपरौढ़ा कमाई ही इतनी थी कि तनख्वाह को छूना नही पड़ता था.......रमई मौका हाथ से जाने नही देना चाहता था.... अपना सारा जमीन बेचकर उसने कमली का ब्याह पूरी शानो-शौकत से की....कमली अपने घर में महारानी की तरह रहने लगी....
          उधर रमई को जीने के लाले पड़ गये.....आय का प्रमुख स्रोत जमीन रही नही..सिवा मजदूरी करने के...कोई विकल्प नही था उसके सामने........पेट पालने के लिए मनुष्य काम बड़ा या छोटा नही देखता.....जल्द ही उसने जमींदार साहब के यहां हरवाही की नौकरी स्वीकार कर ली....जमींदार साहब नेक दिल इंसान थे..... रमई के ईमानदारी से काफी प्रभावित थे तभी तो वे रमई को तनख्वाह के साथ-साथ अनाज का इन्तजाम कर देते थे...............................................................................................,........................
जमींदार साहब की बेटी थी निर्मला.... नाम के अनुरूप ही उसका स्वाभाव और व्यवहार भी था......कमली के चले जाने पर निर्मला में ही वह कमली का चेहरा देखता रहता.....उसका ख्याल रखता.......निर्मला को भी कोई भाई नही था वह भी रमई के रूप अपने बड़े भाई का अक्श देखती थी.........
                 शादी के बाद कमली पहली बार रक्षाबन्धन पर घर आयी तो घर की अव्यवस्था देखकर नाक भौं सिकुड़ने लगी उसे हर जगह दुर्गन्ध आ रही थी.......किसी तरह राखी बांधी......और राखी बंधवाई उसने मुंह खोलकर मांग ही ली......रमई शर्मिन्दा हो गया....देना तो चाहता था लेकिन उसके पास कमली के हैसियत के बराबर नही था....जेब से निकालकर १०० का नोट जैसे ही आगे बढ़ाया.......
ह्ं... यही करतीन कईहने से चिल्लात् रहल्  राखी पर अइहै जरूर......कमली ने कहा...
बहिनी अभी हमरे पास इतने बा बाद मे दे देब..... रमई ने कहा..
अब तै एह नरक मे आवै क मन नाही करला.... यही कहते हुए कमली उल्टे पांव वापस हो ली...........
           इसीलिए.... वह इस बार वह पूरे इन्तजाम के साथ गया था...गांव के ही दुकान से गरम जीलेबी साथ ले गया था......लेकिन शहर के रसगुल्ला के आगे गावं के जीलेबी क मीठास फीकी लगने लगी थी कमली को.......... रमई के फटे कपड़े.... हवाई चप्पल.... कमली के रसूख पर धब्बा लगा रहे थे........सांझ के बेला में.....बालकनी से देखते ही नीचे उतर कर आयी और दौड़कर गेट पर पहुंची.......................................................................कहां आ गइलअ् यंअ् ह्ं..........कमली ने कहा.
अरे तोहके नाही मालूम ...बिहान रक्षाबन्धन क् त्योहार है.....हम राखी बंधवाये आइल बांटी.....रमई ने रूंधे गले से कहा....
    कहते हैं कि आदमी ज्यों ज्यों आगे बढ़ता है...उसे परम्परा... संस्कृति में पिछड़ापन नजर आने लगता है.....हर जगह खोट नजर आने लगता है.........कमली भी इसके प्रभाव से बच नही पायी थी........
      इ का जाहिलपना है.......हम इ सबके नाही मानिलां.......तूंके देख के सब का कही..चार जनी क हमेशा उठक बैठक रहलाअ्.......यही बुदबुदाते हुए नौकर से गराज में खटिया बिछाने के लिए कही......नौकर से ही खाना भिजवा दिया.............कमली के बोली और व्यवहार से रमई क जैसे पैरों तले से जमीन खिसक गयी..............रामू के साथ लेटा.............लेकिन उसे नींद कहां आयी किसी तरह करवट बदलते बदलते सुबह का इन्तजार करने लगा...........दुख का समय जल्दी कटता नही है...... रमई ने देर करना मूर्खता समझा.....और रात में ही २ बजे घर के लिए चल दिया......
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रमई यही सब सोचते हुए कब बदहोश होकर खटिया से नीचे आ गया किसी को पता नही......रामू जोर से चिल्लाया...... अम्मा....जल्दी आव्....देखअ्..बापू के का हो गइल....टोला मुहल्ला वाले भी जल्दी जुट गइंलैं.....कोई कहता जल्दी अम्बुलेस बोलाव्.... कोई कहता...जईबअ् हो बंगाली डॉक्टर के बोला लेईबअ्...कोई फुंसफुंसाता कऊनो फाइदा नाही.......कोई कहता... बहुत अच्छा आदमी रहल........भाई रहै त रमई जइसन .......
         बात जमींदार के हवेली तक पहुंची लेकिन निर्मला को जानकारी नही थी...... थाली मे राखी लिए रमई के घर की ओर प्रस्थान कर चुकी थी......रमई की हालत देखते ही वह अपने आप को रोक नही पायी....उसे याद आने लगे उसके उपकार,........ लेकिन करती भी क्या......सुबकते हुए उसकी कलाई पर राखी बांधनी शुरू की.....जैसे जैसे धागा लपेटती वैसे वैसे उसके नसों में रक्त का संचार होने लगा....लपेटन पूरा होते...एवं टीका लगाते ही...रमई की आंखें खुल गई......रक्षाबन्धन के धागे में ही मानो उसकी सांस अटकी थी...एक मरे हुए भाई के लिए 'संजीवनी' का काम किया.....निर्मला ने उसके परिवार को उसकी धरोहर लौटा दी.........रमई की मुट्ठी में वही सिकड़ थी जो उसने कमली को देने के लिए रखी थी.....उस अन्तिम धरोहर को निर्मला को देना चाहा तो निर्मला ने मना करते हुए कहा कि....नही....मुझे मेरा भैय्या मिल गया उससे बढ़तर मेरे लिए कुछ नही........

     रक्षाबन्धन की अग्रिम बधाई के साथ ही..आप का.....
     

लेखक
डॉ0 अनिल कुमार गुप्त,
प्र०अ०, प्रा ०वि० लमती,
बांसगांव, गोरखपुर

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