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हिन्द को हसीन बनाना है

सब कुछ बदल जायेगा;
बस थोड़ा इन्तजार कर लो।
काॅनवेण्ट को देंगे पूरा टक्कर;
थोड़ा सा धीरज धर लो।।

अखबारों की सीमा है एक;
किस-किस को वे छापेंगे?
एक साथ सैकड़ों सूर्यों की;
दमक को कैसे मापेंगे?

पहले से हसीन है हिंद अपना;
कुछ और हसीन बनाना है।
फिर निकले कलाम यहाँ से;
बच्चों को ऐसे पढ़ाना है।।

मजबूत इरादों के आगे;
चुनौतियों की चाह बड़ी है।
एक से बढ़कर एक समस्या;
मुँह खोले राह खड़ी है।।

पर ठीक-ठीक मालूम है मुझे;
कि लहरें कोमल होती हैं।
टूट जाती हैं चट्टानें उनसे;
कि उनमें दोलन होती हैं।।

टूटेगा मिथक एक दिन;
जो चला आ रहा सदियों से।
कभी सुना है, कहीं आपने;
पाहन जीत गया नदियों से?

रचयिता
अशोक कुमार गुप्त
स0अ0
प्रा0 वि0 टड़वा रामबर
क्षेत्र- रामकोला
जनपद- कुशीनगर


                       

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