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बरस उठे घन घन बदरा

बरस उठे घन घन बदरा
मोती सा गिरे पावन जल

वर्षा कुछ इस तरह बरसोे
जाए मन मचल - मचल

कि मात्र धरा ही नहीं
दिल के मैल धुल जाएं

राग द्वेष सब भूल के
आपस में प्रेमगाथा गाएं

साथ रहे और साथ चले
राह देश के उत्थान की

हर बच्चा और बड़ा करे,
रक्षा देश के अभिमान की

सौहार्द और सद्भाव आपस में
कुछ इस तरह घुल मिल जाए

धर्म जाति रंग और लिंग
मुख्य नहीं गौण हो जाए

बरसाओ ऐसा जल झर झर
होके पावन तन और मन

सुकल्पनीय जीवन रचना में
हो तत्पर युग की नव पीढ़ी

जो मुक्त करे मातृ धरा को
दूर करे असंतुलन कि सीढ़ी

और बनें रचयिता नवयुग के
सुखद अलौकिक नवयुग के

रचयिता  
मीनाक्षी भारद्वाज, स0अ0, 
प्रा0 वि0 भगवतीपुर घेर,
विकास खण्ड-सालारपुर,
जनपद-बदायूँ

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