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हमारा कोई घर नही होता

हमारा कोई घर नही होता
पहले होता है पिता का घर
फिर पति का घर
कहा जाता है मायके में
जाना है पराये घर
ससुराल वाले पुकारते हैं परजाई
हम तो ज़ीनत है फक़त घर की
जिस से सजता है घर
हम महज़ ख़ामोश बुत है
जिनसे ज़ेब देता है घर
जिस दिन बोल पड़े
नही रहेगा ये हमारा घर
नही होता हमारा इख़्तियार किसी फैसले पर
तो चलो क्यों ना खुद का एक घर बनाये
अपने सपनों को खुद सजाए

रचयिता
अर्चना अरोड़ा,
सहायक अध्यापिका,
प्रा०वि० बरडीहा,
विकासखण्ड- कप्तानगंज
जनपद -कुशीनगर

2 comments:

  1. बेहद सुंदर एवं मर्मस्पर्शी रचना!

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