रामू चचा की टोली
विकास गर्मी की छुट्टियों में अपने
नानी के यहाँ गया था। वहाँ अपने मामा के लड़के आकाश के साथ खूब मौज-मस्ती
कर रहा था। वह सुबह-सुबह अपने मामा के आम के बगीचे में आकाश के साथ पहुँच
जाता था। सुबह की ताजी हवा और पके-पके आम, न कोई रोक, न कोई टोक। विकास की
छुट्टियां बड़े मजे से बीत रही थी। विकास को मित्रमंडली बनाने में देर न
लगी।
एक दिन वह अपने मित्रों के साथ अतिया-पतिया खेल रहा था कि अचानक रामू
चचा को देख सभी बच्चों ने प्रणाम किया। "चचा हम लोगों का स्कूल कब खुलेगा"? - आकाश ने पूछा। "बस लल्ला अब तो स्कूल जल्द ही खुलने वाला है"-रामू चचा ने
जवाब दिया। 'लल्ला ये कौन है'?-चचा ने पूछा। 'चचा यह विकास है मेरे बुआ का
लड़का गर्मी की छुट्टियां बिताने आया है' -आकाश ने जवाब दिया। 'कल विकास को
यहाँ का स्कूल दिखाने ले आना, मैं वहीँ मिलूँगा', फिर यह कह चचा चले गये।
आकाश! 'ये
चचा कौन थे'? विकास! ये रामू चचा थे, बच्चों से बहुत प्यार करते है और हमारे
स्कूल के अध्यक्ष है। हम लोग इन्हें रामू चचा कहते है। रामू चचा का स्कूल
में बहुत सहयोग रहता है रामू चचा ने हम बच्चों की टोली बनवाये है, जिसके
माध्यम से बच्चों को स्कूल आने के लिए प्रेरित करते है गाँव मेँ रामू चचा
की बड़ी इज्जत है।
अब तो विकास का मन स्कूल देखने को हो गया। वह रात भर रामू
चचा और स्कूल के बारे में सोचता रहा। अगले दिन सुबह-सुबह ही आकाश के साथ
वह स्कूल चल दिया। स्कूल गाँव में ही तालाब किनारे था। स्कूल देखते ही
विकास की आँखे खुली की खुली रह गई, शायद इतना सुन्दर स्कूल अब तक नहीं देखा
था। स्कूल की चहारदीवारी पर अंग्रेजी वर्णमाला बहुत ही करीने से सजाया गया
था। जो दूर से ही चमक रहा था। एक बड़ा से गेट जिसमें ताला लगा था। न कोई
नुकसान न ही छेड़-खानी। विकास यह सब देख दंग था। उसका स्कूल तो इसके आगे कुछ
भी नहीं था। तब तक रामू चचा भी स्कूल अ गये। गेट का ताला खोलकर विकास को
मित्रों के साथ अंदर ले गए।
विकास तो जैसे परियों के देश में पहुँच गया हो
यह स्कूल है या पार्क। स्कूल ग्राउंड में छायादार वृक्ष, तरह-तरह के फूलों
का महकता उपवन, कमरों के दीवारों पर ज्ञानवर्धक सूक्तियां, सूचनाएं,
निर्देश, कर्तव्य आदि-आदि। विकास का मन इस स्कूल में दाखिले के लिए ललचाने
लगा। 'चचा इस स्कूल का फीस बड़ा महंगा होगा' - विकास ने पूछा। इतने में सब
बच्चे हँसने लगे। 'अरे लल्ला सारी सुविधाएं निःशुल्क है'। 'यह गाँव का
प्राइमरी स्कूल है' - चचा ने जवाब दिया। 'प्राइमरी स्कूल' ! विकास चौंक गया। 'पर
चचा इतना स्वच्छ और सुन्दर प्रांगण'। 'विकास लल्ला यह सब हम गाँव
वालों, प्रधानजी, मास्साब के पारस्पारिक सहयोग से हो पाता है, और मजे की बात
यह है कि इस स्कूल के आगे कोई भी कॉन्वेंट स्कूल नहीं टिक पाता है। न जाने
कितने खुले और बंद हो गए'। 'यही नहीं लल्ला अमीर हो या गरीब सब के बच्चे
इस स्कूल में पढ़ते है'। 'चचा मेरा नाम भी यही लिखवा दो' -विकास ने कहा।
लिखवा दो नहीं समझो लिख गया और तुम रामू चचा के टोली के सदस्य बन गए ।
रामू चचा की टोली की ........जय!

योगेन्द्र प्रताप मौर्य
(स.अ.) प्रा.वि.मंगरा ,बरसठी,
जनपद - जौनपुर
विद्यालय प्रांगण का चित्र वास्तविक प्राइमरी स्कूल का ही है। बाराबंकी मे कार्यरत सुशील कुमार जी का स्कूल का यह चित्र साभार लिया गया है।
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