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जीना हेतु परहित

सत्य यही बात है कि जीते सभी निज हेतु
जीना किन्तु परहित काम सच्चे वीर का।
मानव की परिभाषा सच्चे बोल मीठी भाषा
अंतस में दर्द किसी पीड़ित की पीर का।
देश की प्रगति तब मिल के रहेंगे सब
भेद न रहेगा जब दाता व फ़क़ीर का।
जानते नहीं ये बात गूढ़ मतिमूढ़ जैसे
जानता नहीं है काग भेद नीर क्षीर का।
रचनाकार- निर्दोष कान्तेय
काव्य विधा- मनहरण घनाक्षरी छंद
शिल्प- चार चरण का छंद, प्रत्येक चरण में 8-8-8-7 वर्ण पर यति, चरणान्त लघु गुरु।

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