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ग़ज़ल

ऐ जिन्दगी अब कैसे करूँ तेरा शुक्रिया..
गमों के सफर को तूने थमने न दिया।
जब भी उसे चाहा मैंने तुझसे भी ज्यादा...
पुराने ज़ख्मो को तूने फिर से हरा किया।
माना कि वो हो नहीं सकते थे मुहब्बत में मेरे...
मजबूर दिल था मुझे दिल ने मजबूर किया
अक्सर मेरा दिल ही मुझे लगता है मेरा दुश्मन...
दिल ने शायद मेरी जिंदगी का सौदा किया।
अब तो लगता है इश्क़ में जायेगी जान भी..
किस मोड़ पर लाकर तूने मुझे खड़ा किया।
किससे कहूँ अपना दर्द हँसती है ये दुनिया...
कागज व स्याही को मैंने हमदर्द बना लिया।


 ✍️
बृजेश श्रीवास्तव
उरई (जालौन)

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