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उम्मीदें

उम्मीदें
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शेष 
मैं ही तो बचा हूं आज
शायद नहीं !
तुम्हें तो
विश्वास भी नहीं होगा
मेरे 
खोखले शरीर से तुम्हें
खोखली आवाज़ ही सुनाई देगी
जाओ
जाकर देख लो
खूंटे पर टंगी
कतरनों को जोड़ - जोड़ कर बनी
मेरे कुर्ते की जेब को
जिसका
एक - एक सिरा
तुम्हें 
संवारने की बेताबी में जाने कब का
एक - एक कर उधड़ चुका है
तुम्हें तो शायद ?
नहीं - नहीं  मैं ही गलत था
जो बचाकर रखा था 
इन उखड़ती एक - एक सांसों से 
कुछ को बचाकर
और 
देखता रहा जाने क्यों 
तुम्हारे गठीले होते बाजुओं को...

✍️
राजीव कुमार
स. अध्यापक
पू. मा. वि. हाफ़िज़ नगर
क्षेत्र - भटहट
जनपद - गोरखपुर

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