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बुढ़ापे का दर्द(एनपीएस में बुढ़ापा)

बुढ़ापे का दर्द
(एनपीएस में बुढ़ापा)

" _देखिये जी आज तो आपको फैसला करना ही होगा", आरती राकेश के आफिस से
आते ही रोज की तरह सवालों का बौछार करती है :
राकेश गुस्से में "आखिर आज क्या हुआ?"
अरे आपके पिताजी ने आज तो हद ही कर दी, रोज तो सब्जी लाने में पाँच-दस रूपये
का हेर-फेर करते थे । लेकिन आज तो परे पच्चास रूपयों का हेर-फेर कर डाला न
जाने इन रूपयों का क्या करते हैं? कही शराब-वराब तो नही- हे राम-राम"
राकेश अरे तुम तो जो मुँह में आता है बक देती हो रूको पहले एक कप
चाय लाओ पी लू तब पिताजी से पूछता हूँ।"
आरती चाय-वाय बाद में पीना पहले पिताजी से इसका फैसला करो, कि
अगर उनको ऐसी ही हरकतें करना है तो साफ-साफ कह दो कि घर छोड़ दें।
राकेश
अच्छा तुम बड़बड़ाना बन्द करो मैं जाता हूँ ।
राकेश गुस्से में पिताजी….पिताजी…. की आवाज लगाता अपने माता-पिता के
कमरे में जाता है ।"
राकेश की माँ कपकपाती हुयी आवाज में पूछती है
क्या बात है बेटा
क्यों इतना परेशान हो, पिताजी तेरे कहीं गये हैं बात तो बता।
राकेश…...
माँ देखों रोज तो पिताजी बाजार से सामान
लाने में पॉँच-दस रूपये की छोटी सी चोरी करते थे लेकिन आज तो पूरे पच्चास रूपये
चुराए हैं, न जाने ये पैसा क्या करते है। हम दोनों ने तो उनकी देख-रेख में कोई कमी
नही छोड़ी है । फिर वो ऐसा क्यों करते हैं? आखिर क्या जरूरत थी उनको चोरी करने
की
राकेश की मां ...ऐसा गत कह बेटा अपने बाप पर चोरी
की इलजाम मत लगा ।
राकेश….
आयें तो कह दीजिएगा, हमसे मिल लेगें ये
कह कर राकेश वापस चला जाता है।
रोते हुए राकेश की माँ
यही दिन था बाकी देखने
को भगवान क्यों नहीं मुझे ये दिन दिखाने से पहले ही उठा लिया, क्या जमाना आ।
गया है । बेटा ही बाप पर चोरी का शक कर रहा है।
तभी प पर्दे के पीछे जा छिपे राकेश के पिता जी बाहर आकर राकेश की मां
को
चुप कराने लगते है।
चुप हो जा भाग्यवान शायद हमने पिछले जन्म में कोई पाप किया था,
जिसकी सजा हम दोनों को इस जनम में मिल रही है।
क्योंजी आखिर जब आपने कोई गलत काम नही किया तो राकेश की
आवाज सुनकर पर्दे के पीछे क्यों जा छिपे थे।"
"अरे! तुम भी मुझे गलत समझ रही हो, अरे राकेश चाहें मुझपर चोरी का
इलज़ाम लगाये या डकैती का, मै तो पर्दे के पीछे इसलिए जा छिपा था कि वो कहीं मेर
हाथ में ये फल और जूस देखकर न छीन ले, जो मै तुम्हारे लिये लाया हूँ।"
राकेश की माँ - आप को इन सब चीजों को लाने की क्या जरूरत थी?
आखिर चोरी का इलज़ाम लग रहा है। और आप फल और जूस ला रहे हैं।
"अरे, पिछले एक महीने से तुम्हारी तबियत खराब चल रही है, किसी ने
तुम्हे देखने आया, आखिर बहु न सही वो तो दूसरे के घर से आयी है तुम्हारे बेटे को
तो आना चाहिए था।
तुमने इसी " कमीने " के लिये कितनी मन्नित मुराद मानी और नौ महीने
कोख में रखा और इसका सिला क्या मिला, कहते है। बेटा मॉ -बाप के बुढ़ापे की लाठी
होती है।
लेकिन लगता है उस लाठी की हमने ठीक-ठाक से देख-भाल नही कि
जिसकी वजह से लाठी में दीमक लग गयी ।
अच्छा
लो बात कम करो, पहले ये जूस पी लो ।
नहीं मै नहीं पिऊंगी ये मेरे लिये जहर है, इससे अच्छा आप जहर ला कर
दे दें । खाकर इस नरकिय जीवन से छुटकारा तो मिल जाता । अरे पागल….तुम दूसरों के लिये नहीं मेरे लिये जियो, 
-- -
अगर तुम नहीं रही तो मेरा क्या होगा? जरा मेरा तो ख्याल करो,
अच्छा उठो जल्दी पिऊ, और राकेश की मां जूस पी लेती है।
रात में खाना-वाना खाने के बाद, राकेश अपनी पत्नी के कहने पर रामू
नौकर को भेजकर बाबू जी को बुलवाता है।
बाबू जी, चलिये आपको मालिक बुला रहे हैं ।
रामू
अच्छा चलो मैं खाना खा कर आता हूँ । रामू खान पर नजर डालकर मन ही मन 
मालिक-मालकिन पर कुछ बुद-बुदान लगता है और वापस चला जाता है। राकेश की मां राकेश के बापू को समझा बूझा कर भेजती है कि बह उन दोनो के मुँंह न लगेंगे
चुप-चाप बात सुनकर चले आयेगे। राकेश के पिता राकेश से मिलने उसके कमरे में
जाते है।
आईये पिताजी आईये
क्यों बुलाया, राकेश क्या काम है?
इन्होंने क्यों बुलाया आप तो अच्छी तरह जानते होंगे । क्यो माताजी ने आप से नहीं
बताया राकेश आरती को डांटते हये चुप रहने को कहता है ।
राकेश
देखिए पिताजी आपकी आदतें दिन प्रतिदिन
बढ़ती जा रही है। पहले तो आप सामान लाने में पाँच-दस रूपये का हेर-फेर करते थे,
लेकिन हम कुछ नही कहते थे । आज तो आपने पचास रूपये का हेर-फेर किया ।
आखिर ऐसा क्यों किया
आरती
अरे ये हेर-फेर क्या लगा रखी है, सीधे-सीधे
क्यों नहीं कहते इन्होंने चोरी की है।
देख बहू तू चोरी का इलज़ाम मत लगा, मैने कोई चोरी नहीं की बल्कि
अपने बेटे का पैसा लिया और हर बाप का अपने बेटे के हर समान पर हक होता है।
आरती
बस बेटे का हक तो होता है, पर बाप का
नहीं
अरे बहू मैने तुम लोगों के लिये क्या - क्या नहीं किया सारा
रिटायरमेंट का पैसा, जो थोड़ी पेंशन मिलती सब कुछ तो तुम लोगों ने ले लिया, बल्कि ये मकान भी तुम
लोगो के नाम भी कर दिया है । अब क्या चाहती हो?
राकेश
पिताजी ये तो हर बाप का फ़र्ज़ होता है। आपने
तो बाप का फ़र्ज़ निभाया ।
तभी आवाज सुनकर राकेश की माँ लड़खड़ाती हुई आती है और कहती
है हाँ बेटा ये तो हमारा फ़र्ज़ था, क्या ये भी फ़र्ज़ था कि जब तू चपन में बिमार पड़ा
तो हम दोनों रात दिन जाग-जाग कर, एक बक्त का खाना न खा,_ तुम्हारे लिये अच्छी
से अच्छी दवा इलाज़ की। क्या ये भी फ़र्ज़ ही तो था जब तुझे अपनी नौकरी के लिये पैसों की जरूरत
थी तो तेरे पिता जी ने अपनी पूर्वजों की कीमती ज़मीन कौड़ी के भाव बेचकर तेरी नाकरी के लिये पैसों का इन्तजाम
किया।
और बेटा इन सब का सिला क्या दिया बासी खाना, कटे-फटे कपड़े,
रहने के लिये कोठरी भी ऐसी जिसमें कुत्ता भी रहना न पसन्द करे। और ये कह कर
राकेश की माँ जोर-जोर से खॉसने लगती है ।
अरे भाग्यवान तुझे मना किया था, कि यहाँ मत आना, पर तुँ क्यों आई।
चलो कमरे में चलो …..
राकेश नही पिताजी आज आपको फैसला करना ही होगा कि आप अपनी
आदत सुधारगें या फिर ये घर छोड़ेगें " वाह बेटा वाह " इस औरत को आये अभी छ:
महीने भी नहीं हुये और तू इसके गुण गाने लगा ।
हम जो तेरे इतने जीवन के साथी रहे हमारी कोई औकात नहीं ।
देखिये पिताजी आरती को कुछ न कहिए
हा बेटा मै कहा कुछ कह रहा हूँ ।
आरती
छोड़िए जी इन चोरो के मुँह क्यों लगते है।
देख बहू जबान संभाल कर बात कर, तुझे हम चोर नजर आते है। राकेश
बहु को समझा दो ।
राकेश
पिताजी, आरती ठीक ही तो कह रही है। अच्छा बेटा
यानी हम तेरी भी निगाह में चोर है। और ये कह कर राकेश के पिताजी राकेश पर
हाथ उठा लेते है।
राकेश पिताजी का हाथ पकड़ कर कहता है -" पिताजी अगर आप का
हाथ उठ सकता है तो मेरा भी उठ रकता है ।
इस बीच राकेश की मां दोनों को छुड़ाने आती है तभी राकेश धक्का
देकर किनारे करता है और वो जाकर सीढ़ी से टकरा कर गिर जाती है और वहीं
भगवान को प्यारी हो जाती है।
पुलिस आती है तो राकेश की बीबी राकेश के पिता को उलटे फंसा देती
है।
इन्स्पेक्टर साहब
पिताजी शराब पीकर आये और माता जी को गाली
देने लगे, माताजी के मना करने पर वह उनको ढकेल दिये जिससे सीढी से टकराने से
मौत हो गयी।
नहीं इन्स्पेक्टर साहब वह झूठ बोल रही है। 'क्यों बहू तुझे भगवान के
पास नहीं जाना है कि तू झूठ बोल रही है ।
पिताजी के लाख मना करने पर भी पुलिस उनको पकड़ ले जाती है और
वहीं खड़ा राकेश चुप-चाप तमाशा देखता रहता है ।
अदालत पिताजी की उम्र का ख्याल करते हुये और अन्जाने में हुये हादसे
के कारण पाँच वर्ष की सजा सुनाती है।
धीरे-धीरे करके ये पाँच वर्ष बीत गये। इस बीच राकेश को पुत्र रत्न की
प्राप्ति हुई ।
पाच वर्ष पश्चात् राकेश के पिताजी उसी घर में वापस जाते हैं लेकिन
हत्यारा और चोर कह कर उन्हें वापस भगा दिया जाता है।
जाड़े की कड़ाक की ठंड में एक फटा कुर्ता-पैजामा पहने वे सड़क पर
चलते-चलते थक कर एक पेड़ के नीचे वैठ जाते है। सवेरे नगर महापालिका की गाड़ी
को एक लावारीश लाश मिलती है वो लाश और किसी की नहीं बल्कि राकेश के पिता
की थी जो रात भर ठंड से अकड़ गयी थी ।
ये तो मात्र मेरी कहानी का एक काल्पिनिक पात्र था सो कागज पर मैने
लिखा और आपने पढ़ा लेकिन न जाने कितने राकेश के पिता अपनी औलाद के लिये
मिन्नत-मुराद मानते है और उनके लिये अपनी खुशियों की बली चढ़ाते है, और
आवश्यकता पड़ने पर अपने अंग तक बेचने को तैयार हो जाते है।
मगर उसका सिला क्या मिलता है ? वही नगरमहापालिका की गाड़ी
की शोभा बनना ।

समाप्त
✍️
अब्दुल्लाह खान(स.अ)

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