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ये लग गई किसकी नजर👁️👀

ये  लग गई किसकी नजर👁️👀

सूना सूना पड़ा विद्यालय का परिसर,,,, I
ये लग गई किसकी नजर,..!
हुआ क्या है ऐसा ?
विद्यालय की व्यवस्था पर!
पड़ा है कुंठित सा असर,,,।
विद्यालय के आंगन में
जहां खिलखिलाती हंसी थी
वह हंसी आजकल कहीं खो गई है ,,...! वह कमरे जिनमें
उठता बच्चों का शोर
वो कमरे शांत हो अब बंद पड़े हैं
ना है डस्टर ....ना ही ...!
चाक की है जरूरत ,,...।
बड़े आत्मविश्वास से
बच्चों को समझा कर !
लिखते थे जिस धरातल पर
हाथों को घुमा कर !
वो श्यामपट्ट भी अब खाली पड़े है 
वो खेल कुछ निराले 
मिल बैठ झुंड बना के।
खेल के परिसर में
दौड़ते जहां सब मिलके
वहां अब कांटों फूस झाड़ के झुंड खड़े हैं ....!
देखो ना आज ये.....आखिर 
लग गई किसकी नजर ?
पड़ जाते थे कम जब घंटे ..अक्सर 
किताबों को हर एक से पढ़ाने में
 आज वो घंटे बैठे बिताने में       पहाड़ों से भी लंबे लग रहे हैं ।
बेंचों पर बैठने की खातिर
जो लड़ते थे आपस में... अक्सर
वो बेंचे अब हर कक्षा में तन्हा पड़े हैं.......हर तरफ बस अब ,,,
खामोशी ही खामोशी!!
उनकी प्रतीक्षा में  
हम सब खड़े हैं ।
पता था क्या ?एक दिन
ऐसा भी होगा !
हम तो स्कूल जाएंगे
पर बच्चों की प्यारी बातें
सुनने को तरस जाएंगे ।
कुछ आकुलित है विद्यालय आने को.....!
मैं हूं मजबूर उन्हें ना बुलाने को,,।
ऑनलाइन पढ़ाने के आदेश आए हैं ।
व्यथित है मन इस व्यवस्था का
संचालन ना हो पाने से ।
बिना मोबाइल भला बताओ
कैसे इन्हें पढ़ाएं हम ?
अब तो बस अभिलाषा है
यह कठिन समय बीत जाए।
शीघ्र सब कुछ बदले .....और..
विद्यालय अपना खुल जाए ।
पुनः नन्हे फूलों को
प्रांगण में खिलता देखे हम।
आनंदित हो मन ये,,,,
खुशियों में मुस्काए ।
नजर.. लगी जो विद्यालय को,,
वो नजर ....उतर अब जाए..।।

✍️
दीप्ति राय (दीपांजलि)
सहायक अध्यापक
प्राथमिक विद्यालय रायगंज
खोराबार गोरखपुर

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