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काश! तुम होते इस बार

15 अगस्त के दिन अपने बच्चों को याद करती उनकी शिक्षिका की कुछ लाइन अपने बच्चों के लिए.........

काश! तुम होते इस बार

कुछ उदास सा है स्कूल का ये 15 अगस्त
मानो कुछ ढूंढ सा रहा हो
किसी अपने को,
अपने किसी संगी साथी को
जिससे खिलखिला उठे ये आंगन
जैसे बगिया में फिर से फूल खिल जाए
चहचहा  उठे स्कूल का वो हर कमरा
जिससे रौनक फिर से लौट आए
जैसे स्कूल की दीवारें कुछ कह सी रही है
काश! तुम आज होते तो मै भी खिल उठती
तुम्हारे दौड़ने से,
तुम्हारा मुझ पे चढ़ कर कूदने से
पर तुम तो हो नहीं,
न इतनी जल्दी आओगे
स्कूल का ये आंगन अब सुना पड़ा है
जैसे तुम्हारी याद में गुमशुम चुपचाप सा खड़ा है
अबकी ना लड्डू पे मारामारी होगी
न कार्यक्रम में बढ़ चढ़ कर हिस्सेदारी होगी
न ढोल बजेगे,
न बच्चे नाचेंगे
ना ही बच्चों को संभालने की जिम्मेदारी होगी
इस बार की मिठाई भी फीकी सी है
तुम्हारी याद में चाय भी तीखी सी है
काश! तुम भी होते इस बार
फिर स्वतंत्रता की खुशी बांटते साथ साथ
तुम शोर करते,
मै चुप कराती
तुम्हे डंडे का रौब दिखाती
फिर तुम्हारी मीठी सी मुस्कान पर
मै भी हस देती हर बार
प्लीज़ आ जाओ ना इस बार
देखो!अब लौट आओ
अब नहीं रहा जाता तुम्हारे बिना
जैसे काटने को दौड़ता है स्कूल का हर कोना
जैसे काटने को दौड़ता है स्कूल का हर कोना..........!!

✍️
साधना सिंह (शिक्षिका)
प्रा.वि.उसवा बाबू
खजनी, गोरखपुर

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