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भारत का लोकतंत्र और मतदाता

बाबा साहब अम्बेडकर ने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संविधान की रचना की और तत्कालीन भारत की संसद ने उसको मान्यता दी। आज प्रश्न यह है की क्या हमारा लोकतंत्र हमारे विकास में बाधक हो रहा है। सुनने में बड़ा ही अजीबोगरीब लगेगा पर यदि गहनता से विचार करें तो पायेंगे कि पड़ोसी देश चीन 1947 में  हमसे पीछे था पर क्या कारण है कि आज वो हमसे काफी आगे निकल गया है। कुछ चीजों पर आत्ममंथन की जरूरत है। कुछ स्थानों पर आत्म परीक्षण की आवश्यकता है। देश की आजादी के 70 सालों बाद भी हमारे देश की शिक्षा दर 70 % से ऊपर नही पहुंच पायी है। जो कि अपने आप मे बहुत ही भयावह स्थिति को दर्शा रहा है। समस्या तब और भी गंभीर हो जाती है जब 70% का एक बड़ा वर्ग सिर्फ शिक्षित तो है पर सिर्फ नाम लिखने तक सीमित है। उसकी शिक्षा उसके रोजगार में सहायक नही है। वो एक कुशल कामगार नही है। उनका विवेक दृष्टांत शून्य है, और उनके ऊपर देश की कुशल सरकार चुनने की महती जिम्मेवारी है। वो अशिक्षित व्यक्ति/हस्ताक्षर करने तक सीमित शिक्षित व्यक्ति देश के लोकतंत्र में प्रदत्त अधिकारों का इस्तेमाल कर नेता चुन रहा है। तो फिर इस बात पर बहस कैसी की एक पुलिस की अपराध रजिस्टर में अंकित व्यक्ति विधायक या मंत्री बन जाता है। जब वोटर का वोट करने के समय देश से पहले अपनी जाति/धर्म/कौम आड़े आ रही है तो इस देश मे कुशल राजनीतिज्ञ की कल्पना करना बेईमानी हो जाता है।
अपना एक संस्मरण लिखना रहा हूँ। निकाय चुनाव के दौरान एक बस्ती में जाना हुआ। वहां की जनता से अलग अलग व्यक्तियों से बात की किसी भी व्यक्ति ने उम्मीदवार के व्यक्तित्व पर चर्चा नही की, किसी की जाति किसी का मजहब किसी को पार्टी सिंबल पर समर्थन देने की बात वोटर्स द्वारा कही गयी। अंत मे सबसे चौंकाने वाले वक्तव्य से मेरा सामना हुआ। एक वोटर ने मुझे कोने में ले जाकर कहा भइया जो भी यहां चुनाव से पहले शराब और पैसा पहुंचा देगा बस्ती वाले समर्थन के लिये उधर ही चले जायेंगे। अंत मे एक बुजुर्गवार से मेरा मिलना हुआ उन्होंने कहा बेटा यहां वोट कीमती है और बस्ती वाले उसको ही वसूल करते है क्योंकि वो जानते है कि जो जीतेगा वो 5 साल बाद क्षेत्र में वापस चुनाव लड़ने के दौरान ही नजर आयेगा।
          मैंने खुद से सवाल किया क्या ये वास्तव में सही कह रहे है और मन मे ही उत्तर दे लिया कि ये गरीब हैं, पिछड़े हैं इसलिये लोकतंत्र में अपने योगदान से अनजान है। उसी रात मुझे एक मध्यमवर्गीय परिवार के कार्यक्रम में जाने का मौका मिला। कुछ भद्र विद्वान जन देश की समस्याओं बढ़ती महंगाई, बढ़ते प्रदूषण और राजनीति के भ्रस्टाचार पर चर्चा कर रहे थे। मुझे अच्छा लगा। सोचा अपनी सुबह की अधूरी चर्चा को इनके बीच आगे बढ़ाया जाये। मैंने लोगों से उनके मतदान के बारे में चर्चा की उन सभी भद्रजनों ने मतदान गुप्त होता है इसलिये चर्चा से मत किसको देंगे ये बताने से इनकार कर दिया। मुझे अच्छा लगा कि हमारे देश के पढ़े लिखे लोग मतदान के महत्व को समझते है। थोड़ी देर बाद उस समूह के विभिन्न लोगों का अलग अलग  मेरा फिर से मिलना हुआ। मैंने मौके का लाभ उठाते हुये उनसे अपना प्रश्न फिर से दोहरा दिया। अबकी बार उन्होंने मेरे प्रश्न का उत्तर दिया। लेकिन उनके उत्तर चौकाने वाले थे। यहाँ के लोग सिर्फ अपने निहित स्वार्थ को आगे रखकर वोट देने में इन्ट्रस्टेड थे। मुझे बहुत  आश्चर्य हुआ अभी कुछ देर पहले देश के लिये चिंतित नजर आने वाला बुद्धिजीवी वर्ग सिर्फ अपने निहित स्वार्थ के लिये मतदान में हिस्सा लेगा। जिससे उनके पहचान का/या उसके किसी पहचान वाले कि पहचान का व्यक्ति विधायक/मंत्री बन सके।
          मैंने सोचा कोई नही अभी देश का एलीट वर्ग जिंदा है जो देश के भविष्य के बारे में जरूर सोचते होंगे। एक अनुउत्तरित प्रश्न मन मे समेटे मैंने उस पार्टी से विदा ली। कुछ समय के बाद ही मेरा एक बिज़नेस सेमिनार में जाना हुआ। जहां एलीट वर्ग के लोगों  का आना हुआ । मैंने अपना प्रश्न उस एलीट वर्ग के बीच मे रखा। उनका उत्तर पूर्व के सभी उत्तरों  से भी  ज्यादा निराशाजनक था। उन्होंने कहा जो भी जीतकर आयेगा। वही मेरा अपना होगा। रही बात मतदान की तो देखो अबकी बार चुनाव शुक्रवार को है और शनिवार और इतवार मेरी छुट्टी रहती है। सोच रहा हूं इस बार परिवार के साथ कहीं बाहर घूम आओ। मेरे मन मे गहरा सन्नाटा था, कि क्या वाकई हम देश के लिये चिंतित है या सिर्फ बहसों में ही देश के लिये  चिन्तित प्रतीत होते है।
          आंखों में देश के भावी सरकार की कल्पना चाहकर भी अच्छी नही कर पा रहा हूँ। क्योंकि देश का वोटर आज भी पूर्णतः निजी स्वार्थों पर वोट कर रहा है। देश के लिये वोट करने के पहले नेता को समझना होगा परखना होगा फिर उसको अपना मत(वोट) दान करना होगा।

जय हिन्द जय भारत वंदेमातरम

लेखक
अभिषेक द्विवेदी "खामोश"
प्राथमिक विद्यालय मंनहापुर
सरवनखेड़ा कानपुर देहात।

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