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फिर एक बार

फिर एक बार...
कल्पनाओं के संसार से
चुराना चाहती हूँ कुछ सपने।
फिर एक बार...

सुनना चाहती हूँ अंतस की पुकार
अस्तित्व को बचाने की।
फिर एक बार...

सुनना चाहती हूँ दूर गगन में
पक्षियों की चहचहाहट।
फिर एक बार...

सुगंधित होना चाहती हूँ
फूलों की भीनी खुशबू से।
फिर एक बार...

चाहती हूँ एहसासों को महसूस करना
जो उगते हैं उस जमीन पर,
जिसे विश्वास कहते हैं।

रचयिता
अलका खरे,
प्र0अ0,
कन्या प्राथमिक विद्यालय रेव,
ब्लॉक मोठ,
जनपद झांसी।

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