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खुद दीपक सा जल जा

चारों ओर छाया अंधेरा है ,
इतने दीये कहाँ से लाऊँ ၊
दूर करूँ अज्ञान के तम को ,
खुद दीपक सा जल जाऊँ ၊
एक भावना मन भीतर हो ,
नव प्रकाश बन उम्मीद जगाऊँ ၊
करूँ उपासना शिक्षा मंदिर की ,
सत्य पथ पर बस बढ़ती जाऊँ ၊
दूर करूँ अज्ञान के तम को,
खुद दीपक सा जल जाऊँ ၊
तम ने घेरा डेरा  यहाँ-वहाँ ,
ज्योति पुंज बनकर मैं ,
स्वपनिल तारों पर छाऊँ ၊
जलूँ रात भर बिना थके ,
नयी सुबह प्रभात के नाम कर जाऊँ ၊
दूर करूँ अज्ञान के तम को ,
खुद दीपक सा जल जाऊँ ၊
मन भीतर बैठे अहम तिमिर पर ,
स्नेह के बादल मैं बरसाऊँ ၊
बुझे, बोझिल चेहरों पर मैं ,
खुशी की एक मुस्कान सजाऊँ ၊
दूर करू अज्ञान के तम को ,
खुद दीपके सा जल जाऊँ ၊
बाल मन क्यूं सहमा- सहमा
नवचेतना,नव उल्लास जगाऊँ ,
तुफानों से लड़ेंगे कैसे ,
आओं लहरों का सैलाब दिखाऊँ ၊
बचपन के गलियारों से ही ,
मैं भविष्य की नींव बेजोड़ बनाऊँ ၊
दूर करूँ अज्ञान के तम को ,
खुद दीपक सा जल जाऊँ ၊
हार तो निश्चित है रजनी के ,
आशा के जो मैं दीप जलाऊँ ၊
जहाँ अंधेरा सबसे ज्यादा ,
वहाँ शिक्षा से करूँ उजियारा ၊
सजे जो सपने नव पलकों पे ,
साकार पथ पर अग्रसर कराऊँ ၊
हर दिशा के तम हटाकर ,
मैं प्रकाश प्रहरी बन जाऊँ ၊
दूर करूँ अज्ञान के तम को ,
खुद दीपक सा जल जाऊँ ၊၊

रचयिता
वन्दना यादव 
उच्च प्राथमिक विद्यालय चन्दवक डोभी
जौनपुर

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