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अहिरौली

जैसा होना चाहिये वैसा न होकर वह हो जाये जो नहीं होना चाहिए तो वहाँ आश्चर्य का जन्म होता है। और यदि वह हो जाये जो कुत्सित हो तो घृणा जुड़वाँ बन कर पैदा होती है।
आइये, इसी बात पर एक कहानी पढ़ते हैं।


चौधरी मास्साब प्राइवेट नौकरी की अंगुली त्याग परिषदीय अध्यापक की सेवा का हाथ थाम जब पहली बार अपने विद्यालय पहुँचे तो पहुचते ही रह गए। वह गया गया और भटक गया।
पहले दिन तो खोज भी न पाये। सुना था कर्मठी योद्धा की तरह राय साब पहली बार ही स्कूल का दर्शन कर आये थे। मगर चौधरी मास्साब उन सर्पीले रास्तों को न समझ सके, सांप सीढ़ी का लूडो खेल खेला और जोइनिंग लैटर पा के पहले दिन निराशा का अदृश्य सर्टिफिकेट माथे पे चिपकाए, दीवाली के पहले पहले ज्वाइन कर आये।

जब पहली बार विद्यालय का मुख देखा तो कुम्हलाया चेहरा खिल उठा था, सोचा की देहात में बसा गाँव नदी के कलकल सुना करता होगा और यही मधुर ध्वनि उनके शिक्षक धर्म को गुंजित करेगा।
मगर अहिरौली को कुछ और चाहिए था।
महीने भर हुए, जो बच्चे एबीसीडी पूछने पर बगले झांकते थे वो "GOOD MORNING" कहना सीख चुके थे। साधारण जोड़ घटाने से ऊपर उठ उभयनिष्ठ गुणनखण्ड का अन्वेषण करते, पहाड़े जबानी पे ताम्बूल के कत्थे सा चढ़ रही थी और पन्ने बारिश के कुओं की तरह भर रहे थे। बासी खाना खा के आये बच्चों के बैग में अब सिर्फ एम् डी एम् की थाली ही नही बल्कि कुछ कॉपी किताब भी परिलक्षित होती।

माहौल बेहद खुशनुमा था मगर नियति के गर्भ में दुर्भाग्य पल रहा था। दिसंबर को नियति ने दुर्भाग्य को जन्मा और गाँव में झिंगरु से  झिंगराप्रसाद बने उस निरक्षर को प्रधान बनाया जो सरस्वती को हाथ जोड़ के प्रणाम करना न जानता था, जिसे विद्या के प्रति न आदरभाव था और न ही वह ज्ञान का साधक था।

प्रथम चुनाव में सटीक विरोधी ना पाने से वह बिना विशेष प्रयास किये कुचले हुए मानवश्रृंखला पर चढ़ विजय की दही हांडी तो चख गया पर रहा निरा अनुभवहीन।
अनुभवहीन न केवल अपने कार्य को दूषित करता है बल्कि वह दूसरों की साधना विफल करने का अच्छा साधक भी होता है।

बात शुरू हुई वहीं से जहां से हर परिषदीय विद्यालय मात खा जाता है।एम् डी एम् के लिए भेजे जाने वाली सरकारी मद को मछली की आँख बना नवका प्रधान झिंगराप्रसाद ने अर्जुन सरीखा तीर चलाया तो तीर एम् डी एम् की आँख में न लग द्रौपदी रुपी शिक्षा की आँख में जा लगा और पांचाली रुपी so called education  हाय हाय कर कानी हो गयी।
अब महाभारत इस बात पे शुरू हुई की धृतराष्ट्र को अंधा कहे कौन, वो जो खुद कानी है।
तो वह बीड़ा भी गाँव वालों ने खुद उठाया और जनवरी आते आते मुफ़्त मिली जीत के अधकच्चे महुए ने उन सब के दिमाग में सड़ांध का वो रूप लिया जिसमें बस खुराफात के कीड़े बजबजा रहे थे।
विद्यालय मंदिर न रहा, न रहा उसका प्रांगण पावन।
कभी कोई नशे में मत्त हो के आता और शिक्षकों को नैतिकता के पाठ पढ़ाता फिर जाके घर पे बीवी बच्चों पर हाथ उठाता या वाईसवर्सा।
चौधरी साब उस दिन खूब खिखियाये जब गाँव का पतरुआ अपने लौंडे का नाम लिखवाने आया और
बोला:-" मास्साब, हई एकर बहिन#ो@ो बहुत गारी देला"
खैर, प्राथमिक विद्यालय में ऐसा कोई मानक नही की आप ऐसे बच्चों का प्रवेश लेने से इनकार कर दें।
और पतरुआ के लौंडे का आप कुछ यूं चरित्र निर्धारण कर सकते हैं यथा" बाप का बेटा, सिपाही का घोड़ा, ज्यादा नही तो थोडा थोड़ा।
खैर , विद्यालय में और गाँव में एक नई रौनक थी।
अध्यापक अध्यापन को गरियाते और गाँव वाले अध्यापकों को। कुल मिला जुला के माहौल गर्मी में भीड़ से भरे उस ट्रेन के डब्बे सा हो गया था जिसपे यात्रा करने वाले बिना टिकेट के पैसेंजर ट्रेन के टॉयलेट में जा के फ्लश नही चलाते और पान की पीक बार बार ट्रैन के जंगले पे थूक सरकार की स्वच्छता अभियान पे चिंता जताते, और बगल का साथी मूली भूजा खा के हामी भरते हुए ठुसकी देता चलता हो, और बाकी पैसेंजर उस दमघोंटू वातावरण में बस प्राणवायु तलाशते फिरते हैं।

चौधरी साब किराये के मकान में रहते, और 36 की उम्र में दाल चावल बनाने की कला को अजन्ता एलोरा की गुफाओं की स्थापत्य कला मानते। उन्हें जीवनयापन की यह आवश्यक कला नही आती थी। हुमक के कहते" ऐ बाउ, बर्तन धो देब, झाड़ू लगा देब, बकीर चूल्हा बारे(जलाने) के कार(काम) हम नाही करब"
स्कूल के त्रिपाठी मास्साब की धर्मपत्नी जी को खाना बनाने का उतना ही शौक था जितना नए स्मार्टफोन पर सबको व्हाट्सएप्प का होता है।
बस यही वो दो कारण थे जिसने 5 अध्यापकों को निलम्बित करा दिया।

चौधरी साब के साल 2016 की शुरुआत कुछ यूँ हुई की जनवरी महीने के पहले हफ्ते नए वर्ष की ख़ुशी में त्रिपाठी मास्साब ने सबको बुला टिफ़िन कराया और टिफिन में कटहल की सब्जी,पनीर और मशरूम की भुजिया ले आये।
जाड़े की दुपहरी की भूख थी, सबने खाया। गलती ये की विद्यालय परिसर की मनहूसियत के ख़ामोशी को चीरती 6फ़ीट3इंच लम्बे चौधरी साब की आवाज़ ने उद्घोष किया " ई तरकरिया त मुर्गवा के फ़ैल कई देहलस"

बस, इस आवाज़ को सुन नवजात दुर्भाग्य की नींद टूटी और उसने अपने पैरों पर खड़ा होना शुरू किया।

इस आवाज के गूदे का अर्क परिसर में ही विभीषण का रूप धरे संजय ने झिंगराप्रसाद को मन्थरा छाप मसाले में लपेट के दे दी और लाक्षागृह में आग लग गयी। जो बुझाए न बुझी।

अगले दिन गांव के उन सभी लोगों ने विद्यालय को घेरा जिन्होंने कभी अपने बच्चे को न पढ़ने के लिए नही टोका था,उन महिलाओं ने लाठी हाथ में उठायी जो रोज दारूबाज पति से लतियाइ जाती थीं। वो सब आज जागरूक थे जिन्होंने कभी अपने बच्चे को सवेरे उठ के ताज़ी रोटी न खिलाई, ये शिक्षा के प्रति नही, शिक्षक के प्रति जागरूक रहे जिन शिक्षकों ने इनके आगे वाली भेड़ को एम् डी एम् की हरी फसल चखने देने से इनकार किया था।

मामला अधिकारियों तक गया, कुछ सौ सौ रूपये में बिकने वाली मीडिया तो पहले ही जीभ लपलपा के इन खबरों को चाटती है और अगले दिन अखबार में कटहल मीट बन चुका था और पेप्सी की 2 लीटर के प्लास्टिक के बोतल में 54 किलोमीटर ढो के लाया गया पानी बन गया दारू ।
मध्याह्न का भोजन दावत और पनीर मशरूम की भुजिया अनजाने में ही चखना बन चुके थे।

जब सूचना अंधी और विवेक बहरा हो जाता है तो अन्याय ठहाके लेता है।

अधिकारीयों का क्या, अगले दिन फरमान जारी हुआ, 5 लोग निलम्बित हुए, गेंहू तो पिसा ही, घुन सा दिखने वाला सरसो भी पिसा।

 कहते हैं, जो होता है अच्छे के लिए होता है।
5 महीने बीते, विद्यालय के अध्यापकों को हटा दिया गया, जनता ने राहत की सांस ली और अध्यापकों ने आज़ादी की।
चौधरी साब खुश हैं। अब कटहल बाँग नही देते।

बस।
कथा यही समाप्त।
पर "ऊसर मरन बिदेस, अभइन कुछ बाकी बा"

एक बार नानक ने उनके साथ बुरा व्यवहार करने पर गाँव वालो को एक जगह बसे रहने का आशीर्वाद दिया था और अच्छे व्यवहार करने वालों को बिखर जाने का।
कारण तो आप समझते होंगे।
ये बात अहिरौली गाँव पर भी लागू होती है।

सुना है गाँव के स्कूल पर अब ज्यादातर ताला लटका रहता है।
और स्कूल के प्रांगण में गाँव का गोद लिया वह बच्चा खेल कूद रहा है, बढ़ रहा है, विकसित हो रहा है

पता है उस बच्चे का नाम क्या है
उसका नाम है●●●
दुर्भाग्य

लेखक
यशोदेव राय देবয়शो
(स0अ0 पूर्व माध्यमिक विद्यालय नाउरदेउर)
कौड़ीराम, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश
 


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