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चिप्पीखड़ी

दिसम्बर की समाप्ति एवं जनवरी के आगमन का समय  | जाड़ा पाँव पसारते हुए चरमता पर पहुँच चुका था| गज़ब...की कशमकश दिख रही थी बादलों के छोटे-बड़े टुकड़ों में नीले आसमान को  अपनी काली चादरों में ढकने की! अासमान भी जद्दोजहद कर रहा था खुद के अस्तित्व को बचाने की|
कुछ पलों में तीव्र अट्टहास गूँज उठा!  "जीत हासिलकर चुके थे काले बादल समाहित कर खुद में आसमान को!

आद्रता धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी| मोटे-मोटे भारी भरकम उड़ते हुए वाष्प की बूँदों को  सहेज कर रखने में नाकाम दिख रहे थे ये बादल| वही बादल जिन्होंने कुछ समय पहले अपने जीत का जश्न मनाया था |
कितने असहाय लग रहे थे| टप-टप टपक पड़ी थी ज़मीं पर मोतियों सरीखे कुछ छोटी-बड़ी बूँदें| इठलाते, बलखाते अपनी धुन में झूलते कोमल डालियों, हरे-हरे नाजु़क कोंपलों पर नवयौवना  सा शर्माती  सी लग रही थीं, ये "बारिश की बूँदे !"
ऐसा परिलक्षित हो रहा था मानो ये गुलिस्ताँ दमक रहा हो बिल्कुल धवल किरणों के मुकुट सादृश्य! "स्निग्धता की चादर" ओढ़े! रूई के फाहा सा सफेदी लिए" कुहासा" फैल चुका था चहुँ ओर |

दुबक रहे थे साधन सम्पन्न लोग धीरे-धीरे गर्म लिहाफ का आलंबन लिए, सिमट रहे थे अपने-अपने दायरों में! नीरवता विस्तार कर चुकी थीऔर ठूँठ से हो गए थे हम!  ..........

एक बुदबुदाहट होंठों पर कि......इस बार ठंड अभी से कहर ढ़ा रही है,, न जाने आगे क्या होगा!  दिनचर्या में अजीब सी सुस्ती और चाय के चुस्कियों की आवृतियाँ बढ़ सी गई थी और...............
आँख -मिचौली कर रहा था हठीला सूरज|
अक्सर निकल  जाया करती थी
 मैं अनजान राहों में ज़मीनी लोगों को परखने,   उनके जीवन के पहलुओं को समझने! घुस चली थी मैं झुग्गी-बस्तियों की तंग गलियों में| तिमिर का बसेरा हो चुका था| लालटेन की बाती भक-भक कर टिमटिमाहट रही थी धुँधली-धुँधली सी!
पर...... ....यहाँ का नज़ारा कुछ अलग था | कोई  सूनापन या सन्नाटा नहीं पसरा था  यहाँ| सभी मसरूफ़ थे अपने कामों में  |ऐसा लग रहा था मानो ठंड की सिहरन केवल बड़े तबके के लोगों को ही  महसूस होती  है | तार-तार थे इनके  शरीर के कपड़े!!!
 न कोई लिहाफ, न सुलगते आग की गर्माहट!!  फिर भी.... कोई कँपकँपी  या थरथराहट नहीं दिख रही थी ,यहाँ किसी में! सभी  असीम ऊर्जा  से लबरेज थे|
सच............ कितने बौने लग रहे थे  हम साधन सम्पन्न लोग, इन ऊँचे कद के छोटे तबके के लोगों के ज़ज्बे के सामने! 

तभी एक गेंद मेरे हाथों से टकराई और दृष्टि अनायास उन नन्हें बच्चों की ओर  चली गई जो फटी जेबों वाली निक्कर पहने नंगे बदन इस सर्द  संध्या में, नंगे पाँव खेल रहे थे ,,"चिप्पीखड़ी",जिसे हम पिट्ठूफोड़ भी कहते हैं | बचपन में हम सब ने भी  खेले थे ये खेल |
छोटे-छोटे चिकने चिपटे पत्थरों की ढेरी एक-दूसरे् पर रखे दो टोलियों में बँटे थे ,ये बच्चे!  एक टोली का काम था गेंद फेंक कर खड़ी चिप्पियों को गिराना या पिट्ट ठुओं को फोड़ना| जो  दर्शा रहा था कि किस तरह बदलता मौसम हावी रहता है गरीब तबके के हौसले को  तोड़ने के लिए!

दूसरी टोली का काम गेंद पकड़ में आने से पहले चिप्पियों को एक-दूसरे पर करीने से सजाना ,यानी......गर हौसले बुलंद हो तो बाधाएँ कुछ नहीं  कर सकती चरितार्थ  हो रहा था!

 गिरते-पड़ते,  दौड़ते-भागते ये नन्ही़  जान कर रहे थे एक प्यारी सी कोशिश, फेंके हुए गेंद को पकड़ने की मानो अँधेरे में मुट्ठी में  जुगनुओं को पकड़ रहे हो  रोशन  करने अपने गली-मुहल्लों को| और...........
दूसरी तरफ हो रही थी एक कोशिश करीने से चिकने पत्थरों को एक के ऊपर एक  सजाने  की, मानो जीवन में कितनी सिलवटें  हों, कितनी ही सिलाईयाँ क्यों न उधड़ी हो, दूर कर ही लेंगे सिलवटों को, सिल ही लेंगे उधड़ी सिलाईयों को!
तूफान आए तो आए .....येअपने हिम्मत  से अपनी डूबती कश्ती को  मँझधार से निकाल कर साहिल तक पहुँचा ही देंगे | अपने सपनों को  इच्छाशक्ति का पंख देकर उड़ान भर ही लेंगे|
सच.....
कितने ऊँचे लग रहे थे ये बच्चे मानो आसमाँ को छू कर नक्षत्रों में अपने आत्मविश्वास का परचम फहरा रहे हो!!!
  गोल-गोल चमकती आँखें कह रही थीं कि परिस्थितियों पर विजय पा ली है इन्होंने |खुशियों को समेट कर महसूस करने का हुनर सीख लिया था इन बच्चों  ने!
एक संतुष्टि अपने हालातों से, "परिपूर्ण"  न होकर भी परिपूर्णता की  झलक दिखा रहे थे ये बच्चे ,बड़े ही  मासूमियत से!
खेल हमारे अन्दर मित्रता की, सहभागिता की अनुभूति  कराता है|विभिन्न समुदाय के लोग एक-दूसरे से मिलते हैं और एक-दूसरे की सभ्यता एवं संस्कृति से परिचित होते हैं |   जुड़ते हैं अपनत्व के अटूट बंधन में !खेल साथ ही बनाता हैं हमें स्वस्थ एवं फुर्तीला! हार में भी जीत  का आनंद लेना सिखाते हैं खेल | आऊटडोर गेम आज की जरूरत हैं!!
किन्तु आधुनिकता में रंग कर तकनीकी संसाधनों से लैस होकरआज हम लोगों के बच्चे नए-नए एप्स का इस्तेमाल कर रहें हैं | मोबाइल और वीडियो  गेम की चहारदीवारी में कैद होकर सिमट कर रह गए हैं | सम्पर्क के दायरे छोटे होते जा रहे हैं |  एकाकीपन जड़  पकड़ता  जा रहा है |संवेदनहीनता और अनैतिकता धीरे-धीरे घर करती जा रही है|
 कितनी बदल गई है आज ....बचपन और बचपन के खेल की तस्वीर!
अगर जीवांत हैं ये खेल तो सिर्फ और सिर्फ यहीं !!!! इन्हीं स्लम एरिया में  नहीं तो  फिर गांवों में! !!!
इन बच्चों ने अनजाने में ही मुझे पहुँचा दिया मेरे छुटपन में!! तैर गई मेरे आँखों में वे बचपन की तस्वीर... बचपन के खेलों की तस्वीर... "टिपि-टिपि टिप, स्टापू, छुपा -छुपाईऔर...... "चिप्पी-खड़ी"  और बिखर गई मेरे अधरों पर एक मुस्कान ,पहुँच चुकी थी मैं अपने गंतव्य पर बचपन की मधुर चिप्पीखड़ी की यादों के साथ!एक  शुकराना दिल से इन बच्चों को इस मधुर अहसास का बोध कराने के लिए!!!!!!!
लेखिका
सारिका रस्तोगी,  
सहायक अध्यापिका ,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय,
फुलवरिया, जंगल कौड़िया,

गोरखपुर!!

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