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आई है होली

मन मद है छाया, फागुन आया, ये रुत है मस्तानी।
आई है होली, हँसी ठिठोली, जागे प्रीत पुरानी।
यह मेरी मर्जी, सुन लो अरजी, छेड़ो प्रेम कहानी।
सब दिल मिल जायें, गुल खिल जायें, दुनिया आज दिवानी।
रचना- निर्दोष कान्तेय
काव्य विधा- चौपइया छंद
शिल्प- 10-8-12 मात्राओं के साथ प्रत्येक पद में 30 मात्रायें।
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रंग गुलाल उड़े जग हर्षित उत्सव आवत है जब होली।
ऊँच न नीच रहे तब कोय मनावत आपस में सब होली।
ढोल बजे सब नृत्य करें मिल के यह अद्भुत है ढब होली।
भेद मिटें सब एक रहें यह देश बढ़े सुख है तब होली।
रचना- निर्दोष कान्तेय
काव्य विधा- मत्तगयन्द सवैया छंद
शिल्प- 7 भगण+22
          7(211)+22

साहित्यशाला के सभी पाठकों को सपरिवार होली की हार्दिक बधाई  व कोटिशः शुभकामनाएं।

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