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कान्हा खेलत फाग राधिका संग

कान्हा खेलत फाग राधिका संग
हरा गुलाबी लाल बैजनी सब के लगावे रंग
बरसाने की राधा प्यारी
ललिता बिसा खा सखिया न्यारी
गोरी गुलाबी मतवारी
लगा वे रंगन को अंग अंग

गोकुल का है प्यारो कन्हैया
गाय चरावत. नन्द को छैया
सब के दुःख न को दूर करत है
करत बहुत हुडदंग
कान्हा...............................

लगा वे छलिया देखो राधिका को रंग
ढोलक ढ्प श्री दामा बजावत
ढाप की छाप मारे मन सुखा
बजावत है मृदंग
कान्हा......................

नौ मन के सर की धूम मची है
अबीर गुलाल की होरी मची है
सबे। सब बेसुध हो गये
देख २ह जाये दंग
कान्हा.......................

चन्द्रावल गोपी पकडे क्लाई
वा के मन कूं हर्षा ई
चित चुरा वे मन मोहना
मन का
करत रहत भर भंड
कान्हा...........................

कान्हा सब भक्त न को प्यारो
कालिन्दी जैसा कारोकारो
विनती सुनत ही भागत आवो
छप्पन भोग वाके मने न भावे
जब तक तुलसी का मिले संग
कान्हा.......................

भक्त न के संग बिके कन्हाई
ब्रज म होली की धूम मचाई
मोहत सबको बलराम को भाई
सबके साथ छलिया ऐसो लगत है
तारो बीच जैसे मयंक
कान्हा.....................

रचनाकार
सारिका तिवारी, प्र0अ0,
उ0प्रा0वि0 फुलवामऊ,
वि0क्षे0 बहुआ,
जनपद फतेहपुर

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