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ए सखि कूकुर?ना सखि शिक्षक !

एक नई 'कह मुकरी' रचना..... बस इस विधा के बारे मे इतना ही जान पाया हूँ कि इस विधा को अमीर खुसरो ने पहेलियाँ पूछने के लिये ईजाद किया था.... इसमे मूल भाव कुछ कह कर मुकर जाने का होता है एवं संवाद द्वीअर्थी होते हैं.... इस जानकारी को शेयर करने के लिये भाई निर्दोष दीक्षित जी का हार्दिक आभार ।।
मात्रा-भार आदि कि कसौटी पर भले 'खरा सोना' ना भी हो.... किंतु अपना प्रयास आप सब के सामने रख रहा हूँ ।
                      तब
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जिनका पूजेन वेद-पुरान
जिनका रहा बड़ा सम्मान
तीनों  लोक मा  चर्चा व्यापक
ए सखि भगवन? ना आध्यापक !
जिनकी महिमा से जग उजियारा
देव,राक्षस सबको तारा
जिनका होता घर घर पूजन
ए सखि शंकर?ना सखि गुरूजन !
                     अब
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जितना भूँके , जितना भुभुवाये
वहिकी गति ,कोऊ तरस न खाये
अइसा जीवन जइसे गिट्टक
ए सखि कूकुर ? ना सखि शिक्षक !
पावैं उंई सब काम 'बेगारी'
निपुच गई सारी हुशियारी
बचा न याको मौलिक फ़ीचर
ए सखि ढ़ोर? ना सखि टीचर !
(सुधांशु श्रीवास्तव)

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