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साथी जो साथ छोड़ गये..

साथी जो साथ छोड़ गये..

इक रोज़ गये वे मेले में,
मेले में एक खेला था।
खेल बड़ा अलबेला था,
बुद्ध जनों का रेला था।।

वाक़िफ़ थे अंजाम से वे,
पर न जाना मग़रूरी थी।
चाह के भी टाल न पाते,
उनकी भी मजबूरी थी।।

भीड़ बहुत ही भारी थी,
कैंची,पुस्तक,आरी थी।
कन्नी,घोड़े और किताब,
संग वहांँ अलमारी थी।।


वहीं कहीं अनजान मिला,
अदना सा प्राणवान मिला।रूप,रंग,आकार न जाना,
अदृश्य वह बलवान मिला।।

बदन को पूरा गरम किया,
तासीर समूचा नरम किया।
पहले कोई भाँप न पाया,
लू-लपट का भरम किया।।

जांँच हुई तो साफ दिखा,
सोलह आने साँच दिखा।
कात़िलाना करवट लेता,
बढ़ता उसका ग्राफ दिखा।।

साथी जो साथ छोड़ गए,
दर्द बड़ा गहरा हुआ।
गाथा उनकी कौन सुनेगा?
हर कोई बहरा हुआ।।


✍️
अलकेश मणि त्रिपाठी "अविरल "
( स.अ.)
पू.मा.वि.- दुबौली
विकास क्षेत्र - सलेमपुर
जनपद - देवरिया (उ.प्र.)

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