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ज़िन्दगी से भी अजब नाता रहा

ज़िन्दगी से भी अजब नाता रहा
वक़्त केवल ख़्वाब दिखलाता रहा
हौसला तामीर का जिसमें नहीं
वो रटा इतिहास दोहराता रहा
साजिशें लाखों हुई, क़ायम रहे
जग विरोधी, मेहरबाँ दाता रहा
हकपरस्ती भी उलझकर रह गयी
ये सियासी दौर भरमाता रहा
चाँद था बेबस घटा की ओट में
दिल चकोरी का भी घबराता रहा
सोच भी ले इस जहाँ में ऐ बशर!
किसलिए आता रहा जाता रहा
छा गयीं तुकबन्दियाँ बाज़ार में
शायरी का दौर भी जाता रहा
- पुष्पेन्द्र यादव

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