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कह मुकरी

बिन उसके मोरि रैन कटै न,
जीवन का अंधियार मिटै न,
उसके बिन मैं जल बिन मछरी,
ए सखि साजन? ना सखि बिजुरी!
लई जावै मोरा परिवार,
मोहे घुमावै हाट बजार,
कभी घुमावै नदी पहाड़ी,
ए सखि साजन? ना सखि गाड़ी!
उसको सोचूं नींद न आवै,
उसकी सुधि ही मन लरजावै,
हर आहट निरखूँ चहुं ओर,
ए सखि साजन? ना सखि चोर!
मैं रखूँ उसको अंग लगाय,
बिनु उसके अब जिया नहिं जाय,
हाथ पकड़ मैं झाड़ूं स्टाइल,
ए सखि साजन?नहिं मोबाइल!
जिसकी सीस छाँह मैं  पाऊँ,
उसकी ओट म लाज बचाऊँ,
पर ऊ मोरे जी का झंझट,
ए सखि साजन?ना सखि घूँघट!
देखा उसको भरे बाज़ार,
एकटुक देखन लगी निहार,
ठिठकी जैसे बिगरी गाड़ी,
ए सखि साजन? ना सखि साड़ी!
रचनाकार- निर्दोष दीक्षित
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काव्य विधा- कह मुकरी छंद
छंद परिचय-
                  यह दो सखियों के बीच का संवाद है जिसमे एक सखी दूसरी सखी से अपने प्रिय की बातें बिना उसका नाम लिए बताती है,जब सखी पूछती है कि क्या तुम अपने साजन की बात कर रही हो तो उसे लाज आती है और वो मुकर जाती है तथा किसी और चीज़ का नाम बता देती है जिसका सम्बन्ध पहले कहे गए कथ्य से होता है।
शिल्प- यह चार पंक्तियों का छंद होता है।
प्रथम तीन पंक्तियों में 16 मात्राएँ तथा अंतिम पंक्ति का मात्रा भार 15,16 या 17 हो सकता है क्योंकि यह उस संज्ञा पर निर्भर करता है जो कही जाती है।

2 comments:

  1. साहित्य संसार के एक अद्वितीय व्यक्तित्व के रूप में प्रारब्ध ने आपको गढ़ना शुरू कर दिया...यह प्यास बुझनी नहीं चाहिए.. यह लीक और और और लम्बी होनी चाहिए...शुभकामनाएं...

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  2. http://3.bp.blogspot.com/-jfhIw5BIw9k/UYMcePRzGRI/AAAAAAAAIVs/gq5wDQ-Y9mg/s000/30.gif

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