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प्रेम पगे दोहे

प्रीतम का बस ध्यान है, चैन नहीं दिन रैन।
बहत अश्रु यद्यपि सदा, प्रेम पियासे नैन॥
दूषित इस भूलोक में, दामन लगयो दाग।
साबुन प्रभु के नाम का, दाग भये बेदाग॥
हीरा जैसा होय या, माणिक मोती होय।
पी जैसा इस लोक में, दूजा रतन न कोय॥
भक्ति शक्ति मेरी यही, मेरा यह सत्संग।
रंग पिया का मन चढ़ा, चढ़े न दूजा रंग॥
बातें मन की गूढ़ वे, बाँचत बहुत लजात।
बैन पियारे नैन के, फिर कैसे छुप जात॥
रचना- निर्दोष दीक्षित
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काव्य विधा- दोहा छंद
शिल्प- दो पद, चार चरण,सम चरण तुकांत
          मात्रा भार- 13-11/पद
          पदान्त- गुरु लघु

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