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इंकलाब की तलाश

इंकलाब! यह शब्द सुनते ही जोश से भरी मुट्ठियाँ हवा में उठ जाती हैं, नारों की गूँज चारों ओर फैल जाती है। लेकिन सवाल यह है कि यह इंकलाब आएगा कहाँ से?


इंकलाब की तलाश 

गाँव के चौपाल पर भीड़ जमा थी। हर तरफ़ उत्साह, जोश, और बदलाव की बातें हो रही थीं। मुद्दा वही था—इंकलाब! 

"इंकलाब ज़रूरी है!" रामलाल काका ने छड़ी से ज़मीन ठोंकते हुए कहा।  
"बिलकुल!" नौजवानों ने गला फाड़कर समर्थन दिया।  

"पर कहाँ हो इंकलाब?" हवलदार मिश्रा ने बीड़ी सुलगाते हुए पूछा।  
"हर क्षेत्र में! राजनीति में, शिक्षा में, समाज में!" पिंकू मास्टर ने आँखें चौड़ी करते हुए कहा।  
"कौन करेगा इंकलाब?" चतुरी हलवाई ने पूछा, जो चाय छानते-छानते बहस में घुस चुके थे।  

"हम सब करेंगे!" गाँव के इंजीनियर बेटे मनोज ने बड़े आत्मविश्वास से कहा।  
"कैसे करेंगे?" चौधरी साहब, जो गाँव के सबसे बड़े ज़मींदार थे, गंभीरता से बोले।  
"धरना देंगे, सोशल मीडिया पर ट्रेंड चलाएँगे, क्रांति के नारों वाली टी-शर्ट पहनेंगे!" पप्पू पत्रकार ने जोश में कहा।  

तभी रामसुमेर चाचा, जो हमेशा चुपचाप चौपाल के कोने में बैठे रहते थे, व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ बोले—  
"अरे बेटा, इंकलाब लाने चले हो, पहले अपने घर की टूटी खाट तो खुद से बाँध लो!"

सब हँस पड़े।  

"अरे सही कह रहे हैं चाचा!" लल्लन बढ़ई ने ठहाका लगाया, "गाँव की सड़क तीन साल से गड्ढों में तब्दील है, पर नेता आते ही तुम लोग उसे फूलों की चादर बिछाकर स्वागत करते हो। यही इंकलाब है?"  
"पंचायत भवन की छत से टपकता पानी क्रांति देख-देख कर शर्मिंदा हो गया है!"  
"स्कूल में बच्चे बिना मास्टर के पढ़ रहे हैं, पहले वहाँ बदलाव लाओ!"  
"गंदगी का ढेर हटाने कोई नहीं आएगा, नेता जी भी कह चुके हैं—‘स्वच्छता मिशन में सबका सहयोग ज़रूरी है,’ पर जब सफ़ाई की बारी आती है, तो सबको इंकलाब याद आ जाता है!"  

इंजीनियर मनोज, जो बड़े आत्मगौरव से ‘बदलाव लाने की बातें’ कर रहा था, तमतमा उठा—  
"ये छोटे मुद्दे हैं! हमें बड़ा बदलाव लाना है!"  

चतुरी हलवाई मुस्कुराए—  
"हूँ! बड़ा बदलाव? पर भाई, सोशल मीडिया पर क्रांति के नारे लगाने वाले लोग घर में अख़बार उठाने तक का कष्ट नहीं करते! और जब किसी ईमानदार आदमी को पीटते देखते हैं, तो मोबाइल निकालकर वीडियो बना लेते हैं, लेकिन बीच-बचाव करने के लिए आगे नहीं आते!"

पिंकू मास्टर ने भी तंज कसा—  
"और चुनाव के वक़्त? बड़े-बड़े भाषण देने वाले क्रांतिकारी हाथ जोड़कर कहते हैं—‘भैया, हम तो उसी को वोट देंगे जो जीतने वाला हो!’"  

हवलदार मिश्रा हँसते हुए बोले—  
"इंकलाब के नारे लगाना आसान है, पर घर के बाहर खुद झाड़ू लगाने में क्रांति दम तोड़ देती है!"

अब किसी के पास कोई जवाब नहीं था।  

सन्नाटा छा गया।  

रामसुमेर चाचा उठे, अपनी लाठी सँभाली और जाते-जाते बोले—  
"इंकलाब कोई मंतर नहीं, जो बोलते ही सब बदल जाए। पहले अपने घर, अपने गाँव, अपनी सोच में इंकलाब लाओ, फिर देश की बात करना!"


उस दिन के बाद गाँव में ‘क्रांति के ठेकेदार’ कम और असली बदलाव लाने वाले लोग ज़्यादा दिखने लगे। पंचायत भवन की मरम्मत हुई, स्कूल में एक और शिक्षक की माँग उठी, गलियों में सफ़ाई शुरू हुई, और बिजली के बिल भी समय पर भरने लगे।  

अब चौपाल पर बहस कम, काम ज़्यादा होने लगा।  

इंकलाब नारों में नहीं होता,  
इंकलाब कर्मों में होता है!

इंकलाब चिल्लाने से नहीं आता,
इंकलाब खुद में लाया जाता है!


✍️  व्यंग्यकार : प्रवीण त्रिवेदी  "दुनाली फतेहपुरी"

शिक्षा, शिक्षण और शिक्षकों से जुड़े मुद्दों के लिए समर्पित
फतेहपुर, आजकल बात कहने के लिए साहित्य उनका नया हथियार बना हुआ है। 


परिचय

बेसिक शिक्षक के रूप में कार्यरत आकांक्षी जनपद फ़तेहपुर से आने वाले "प्रवीण त्रिवेदी" शिक्षा से जुड़े लगभग हर मामलों पर और हर फोरम पर अपनी राय रखने के लिए जाने जाते हैं। शिक्षा के नीतिगत पहलू से लेकर विद्यालय के अंदर बच्चों के अधिकार व उनकी आवाजें और शिक्षकों की शिक्षण से लेकर उनकी सेवाओं की समस्याओं और समाधान पर वह लगातार सक्रिय रहते हैं।

शिक्षा विशेष रूप से "प्राथमिक शिक्षा" को लेकर उनके आलेख कई पत्र पत्रिकाओं , साइट्स और समाचार पत्रों में लगातार प्रकाशित होते रहते हैं। "प्राइमरी का मास्टर" ब्लॉग के जरिये भी शिक्षा से जुड़े मुद्दों और सामजिक सरोकारों पर बराबर सार्वजनिक चर्चा व उसके समाधान को लेकर लगातार सक्रियता से मुखर रहते है।

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