वसंत
वसंत
दूर ठिठुरन हो गयी है,
शीत का अब अंत है।
झूम कर खुशियाँ मना,
अब आ गया वसंत है।।१।।
शस्य वसुधा की छवि,
रवि की तपन भी मन्द है।
पुष्प कलियों में सिमटना,
चाहती ये सुगंध है।
सनसनाता पवन ये,
कैसा अगन अब दे रहा।
प्रेम प्यारे पागलों के,
मन चुभन अब दे रहा।
दूर ठिठुरन हो गयी है,
शीत का अब अंत है।
झूम कर खुशियाँ मना,
अब आ गया वसंत है।।२।।
मंजरी मदमस्त हैं चढ़,
आम्र तरु की डाल पर।
पुष्प रस लेता भ्रमर ज्यों,
प्रेयसी के गाल पर।
ताल पर पपीहा है प्यासा,
स्वाति जल के आस में।
चाँदनी चंचल हुई हैं,
चाँद के ही प्यास में।
दूर ठिठुरन हो गयी है,
शीत का अब अंत है।
झूम कर खुशियाँ मना,
अब आ गया वसंत है।।३।।
है विदा लेता शिशिर अब,
ग्रीष्म ऋतु का साथ पाकर।
हाँफता बादल बेचारा,
उष्णता संताप पाकर।
कमल की सरभित कली,
ताल में फिर खिल रही है।
सूर्य की आभा गगन में,
मगन मन ज्यों मिल रही है।
दूर ठिठुरन हो गयी है,
शीत का अब अंत है।
झूम कर खुशियाँ मना,
अब आ गया वसंत है।।४।।
शक्ति संचय का परम,
नवरात्र भी अब गया है।
मातृवत वात्सल्य रस,
सारे जगत में छा गया है।
चैत्र का पावन सुहावन,
माह भी अब आ गया है।
राम के शुभ आगमन का,
भाव चहुँ दिशि छा गया है।
दूर ठिठुरन हो गयी है,
शीत का अब अंत है।
झूम कर खुशियाँ मना,
अब आ गया वसंत है।।५।।
✍️
रमेश तिवारी(स०अ०)
प्राथमिक विद्यालय हरमन्दिर खुर्द
क्षेत्र-फरेन्दा,महराजगंज उत्तर-प्रदेश
📱-९८३९२५३८३३
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