नवल आशीष
नवल आशीष,,....
पेड-पेड नथ उठें
पर्ण-पर्ण हरित हुई
गमक के भोर में
हंस कि किरन लिए
बौर फिर लहर हुई।
पुष्प- पुष्प खिल उठे
नजर- नजर बसंत हुई
प्रेम के हर्ष में
सृजन की तरंग लिए
धारा फिर मगन हुई।
गली -गले गूंज उठे
कर्ण -कर्ण नाद हुई
आगत के निनाद में
विगत की रज लिए
हवा फिर भंवर हुई।
रंग -रंग मिल उठे
उम्र -उम्र फाग हुई
धर्म की विजय में
अधर्म का साथ लिए
होलीका फिर दहन हुई।
राव -रंग बदल उठे
चाल -चाल मस्त हुई
अनंत के भाव में
आत्मीय कसाव लिए
आशीष फिर नवल हुई।।
✍️
नवीन
प्रयागराज
कोई टिप्पणी नहीं