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उम्र के रंग

उम्र के रंग  

जवानी में उबाल था, अंगारों-सा जोश,
हर बात में क्रांति थी, हर सांस में रोष।  
सपनों की उड़ानों में नभ तक जाना,  
हर मुश्किल से टकराना, हर डर को हराना।  

प्रौढ़ावस्था आई तो नशा हुआ परिपक्व,
शब्दों में गंभीरता, विचारों में विवेक दक्ष।  
जोश में संयम था, भावनाओं में तौल,  
हर रिश्ते में संतुलन, हर निर्णय में मोल।  

बुढ़ापे में ढलान, पर अनुभव का प्रकाश,
मिलन की मिठास, और बातों का विश्वास।  
हर शिकन में किस्सा, हर लकीर में ज्ञान,  
बीते पलों का संगीत, और स्मृतियों की तान।  

उम्र का यह सफर, एक सुंदर बदलाव, 
हर मोड़ पर सीख, हर पड़ाव पर ठहराव।  
नशा जवानी का, बुढ़ापे में संज्ञान,
हर रंग में जीवन, हर रंग में जहान।


✍️  रचनाकार : प्रवीण त्रिवेदी  "दुनाली फतेहपुरी"

शिक्षा, शिक्षण और शिक्षकों से जुड़े मुद्दों के लिए समर्पित
फतेहपुर, आजकल बात कहने के लिए साहित्य उनका नया हथियार बना हुआ है। 


परिचय

बेसिक शिक्षक के रूप में कार्यरत आकांक्षी जनपद फ़तेहपुर से आने वाले "प्रवीण त्रिवेदी" शिक्षा से जुड़े लगभग हर मामलों पर और हर फोरम पर अपनी राय रखने के लिए जाने जाते हैं। शिक्षा के नीतिगत पहलू से लेकर विद्यालय के अंदर बच्चों के अधिकार व उनकी आवाजें और शिक्षकों की शिक्षण से लेकर उनकी सेवाओं की समस्याओं और समाधान पर वह लगातार सक्रिय रहते हैं।

शिक्षा विशेष रूप से "प्राथमिक शिक्षा" को लेकर उनके आलेख कई पत्र पत्रिकाओं , साइट्स और समाचार पत्रों में लगातार प्रकाशित होते रहते हैं। "प्राइमरी का मास्टर" ब्लॉग के जरिये भी शिक्षा से जुड़े मुद्दों और सामजिक सरोकारों पर बराबर सार्वजनिक चर्चा व उसके समाधान को लेकर लगातार सक्रियता से मुखर रहते है।

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