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‘शिक्षा? वो क्या होती है!’

‘शिक्षा? वो क्या होती है!’ 


गुरुवार की सुबह थी। महाशक्ति देश के सर्वोच्च नेता ट्रम्पसिंह अपने गोल्फ क्लब में आराम से बैठे थे। अचानक उन्होंने अपने सचिव को बुलाया। सचिव पहले से ही पसीने-पसीने थे। वह समझ गए थे कि आज फिर कोई ऐतिहासिक फैसला होने वाला है, जो किताबों में नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर ट्रेंड करेगा।  

"सुनो, हमने तय किया है कि शिक्षा विभाग को बंद कर दिया जाए।" ट्रम्पसिंह ने अपने सिग्नेचर वाले मार्कर से खेलते हुए कहा।

सचिव हड़बड़ाकर उठ खड़े हुए, "सर, मतलब? शिक्षा विभाग बंद?"  

"हां! सोचो, जब पढ़ाई ही नहीं होगी, तो फिर शिक्षा विभाग की जरूरत ही क्या है?" ट्रम्पसिंह ने गर्व से कहा, "हमने यह फैसला बहुत सोच-समझकर लिया है। सालों से देख रहे हैं कि जितने पढ़े-लिखे लोग हैं, वे सरकार की आलोचना ज्यादा करते हैं। अनपढ़ जनता खुश रहती है, सवाल नहीं पूछती। इसलिए शिक्षा बेकार की चीज है।"  


"लेकिन सर, संसद, विपक्ष, शिक्षक संघ..." सचिव ने डरते हुए कहा।  

"कोई चिंता नहीं, हमने इसका भी हल निकाल लिया है," ट्रम्पसिंह ने मुस्कुराते हुए कहा, "अब से छात्र स्कूल की बजाय टिकटॉक और यूट्यूब पर पढ़ाई करेंगे। जो जितने ज्यादा व्यूज और लाइक्स लाएगा, उसे सरकारी स्कॉलरशिप मिलेगी। इससे रोजगार भी बढ़ेगा और एजुकेशन का झंझट भी खत्म!"  

सचिव ने अचरज से सर्वोच्च नेता को देखा।  

"और हां, शिक्षकों के लिए भी हमने एक शानदार योजना बनाई है।" ट्रम्पसिंह बोले, "अब से शिक्षक 'कस्टमर असिस्टेंट' कहलाएंगे। वे बच्चों को पढ़ाने की बजाय उनकी समस्याएं हल करेंगे। उदाहरण के लिए, अगर किसी बच्चे को मैथ्स कठिन लगती है, तो शिक्षक उसे ऑनलाइन कैलकुलेटर का लिंक भेज देंगे। अगर किसी को विज्ञान समझ नहीं आता, तो उसे साइंस-फिक्शन फिल्में देखने की सलाह देंगे।"  

"लेकिन सर, इससे तो देश में शिक्षा का स्तर गिर जाएगा!" सचिव ने घबराकर कहा।  

ट्रम्पसिंह ने गहरी सांस ली, "देखो, हम सिर्फ शिक्षा विभाग बंद कर रहे हैं, शिक्षा को नहीं। बच्चे पहले ही स्कूल में कम और मोबाइल पर ज्यादा पढ़ाई कर रहे हैं। अब वे अपनी पसंद से पढ़ेंगे – कोई गेमिंग सीख सकता है, कोई डांस मूव्स।"  

"और किताबें?" सचिव ने आखिरी उम्मीद से पूछा।  

"ओह! किताबों की समस्या भी हल कर दी गई है," ट्रम्पसिंह बोले, "अब से किताबें सिर्फ म्यूजियम में रखी जाएंगी ताकि लोग यह न भूलें कि कभी पढ़ाई नाम की कोई चीज हुआ करती थी।"  

इतने में सर्वोच्च नेता के सलाहकार अंदर आए और कान में फुसफुसाए, "सर, विपक्ष इस फैसले का विरोध कर रहा है।"  

ट्रम्पसिंह मुस्कुराए, "यही तो असली परीक्षा है। अगर उन्होंने वाकई पढ़ाई की होती, तो विरोध करने की बजाय हमें इस महान फैसले पर बधाई देते!"  

इसके बाद ट्रम्पसिंह ने ऐतिहासिक आदेश पर साइन किए और टीवी कैमरों के सामने बच्चों के साथ फोटो खिंचवाई। उन्होंने कागज को ऊपर उठाया, और बच्चों ने भी खुशी-खुशी अपनी खाली कॉपियां हवा में लहरा दीं।  

कहते हैं, इसके बाद महाशक्ति देश में शिक्षा को लेकर कोई विवाद नहीं बचा। क्योंकि जब शिक्षा ही नहीं थी, तो विवाद पैदा करने के लिए तर्क कहां से आते?

✍️  व्यंग्यकार : प्रवीण त्रिवेदी  "दुनाली फतेहपुरी"

शिक्षा, शिक्षण और शिक्षकों से जुड़े मुद्दों के लिए समर्पित
फतेहपुर, आजकल बात कहने के लिए साहित्य उनका नया हथियार बना हुआ है। 


परिचय

बेसिक शिक्षक के रूप में कार्यरत आकांक्षी जनपद फ़तेहपुर से आने वाले "प्रवीण त्रिवेदी" शिक्षा से जुड़े लगभग हर मामलों पर और हर फोरम पर अपनी राय रखने के लिए जाने जाते हैं। शिक्षा के नीतिगत पहलू से लेकर विद्यालय के अंदर बच्चों के अधिकार व उनकी आवाजें और शिक्षकों की शिक्षण से लेकर उनकी सेवाओं की समस्याओं और समाधान पर वह लगातार सक्रिय रहते हैं।

शिक्षा विशेष रूप से "प्राथमिक शिक्षा" को लेकर उनके आलेख कई पत्र पत्रिकाओं , साइट्स और समाचार पत्रों में लगातार प्रकाशित होते रहते हैं। "प्राइमरी का मास्टर" ब्लॉग के जरिये भी शिक्षा से जुड़े मुद्दों और सामजिक सरोकारों पर बराबर सार्वजनिक चर्चा व उसके समाधान को लेकर लगातार सक्रियता से मुखर रहते है।

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