प्रेम का रंग होली के संग
कविता....प्रेम का रंग होली के संग 💐💐
कोरे काग़ज़ पर मैंने अरमान यूं निकाला था
दिल की बातों को ख़त में यूँ लिख डाला था....
तेरा मेरा जीवन भर का ये कैसा नाता था
मैं तेरी थी राधा जैसी तू कृष्ण गोपाला था
साँझ सवेरे तकती राहें नयनों से निहारा था
अँखियाँ के झरोखों से निंदिया ने पुकारा था
कोरे काग़ज़ पर मैंने अरमान यूँ निकाला था
दिल की बातों को ख़त में यूँ लिख डाला था....
देखा तुझको गोपी संग मन व्याकुल हो जाता था
पास आ कर मैं चुपके देखूं ऐसा मन हो जाता था
पुष्पों की बेला में उनको कैसे झूला तू झुलाता था
मन करता मैं पुष्प बनु जूं हाथों में आ जाता था
कोरे काग़ज़ पर मैंने अरमान यूँ निकाला था
दिल की बातों को ख़त में यूँ लिख डाला था.....
जब तू चुपके माखन खावे मन में मेरे आता था
मैं मटकी बन जाऊं तेरी जिसको तू चुराता था
मथती मैय्या माखन जैसे डोरी तू बन जाता था
चोरी चुपके माखन जैसे मुझको भी ललचाता था
कोरे काग़ज़ पर मैंने अरमान यूँ निकाला था
दिल की बातों को ख़त में यूँ लिख डाला था......
रंग गुलाल होली में जो तुमने मुझ पर डाला था
सुर्ख गालों में कोपिल रंग सा रंगो ने रंग डाला था
रंगों ने इंद्रधनुष बना कर इंद्र से ये कह डाला था
राधा कृष्ण प्रेम रस का मधुशाला कह डाला था
कोरे काग़ज़ पर मैंने अरमान यूं निकाला था
दिल की बातों को ख़त में यूँ लिख डाला था......
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शाईस्ता सिद्दीकी
कानपुर नगर
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